हम आजकल ‘‘लाला चतुरसेन गुप्त-व्यक्तित्व एवं कृतित्व” ग्रन्थ का अध्ययन कर रहे हैं। इस पुस्तक का सम्पादन आचार्य चतुरसेन गुप्त जी (जन्म शामली 1-11-1906 मृत्यु 23-12-1973) की जन्मशती 2006 के अवसर पर किया गया है। इस ग्रन्थ के सम्पादक गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के उपकुलपति डा. धर्मपाल जी हैं। पुस्तक में पांच अध्याय हैं। पहला अध्याय आचार्य जी का जीवन-वृत्त है। इस जीवनवृत्त से हम व्यवहारभानु एवं दैनिक यज्ञ प्रकाश आदि केवल दो पुस्तकों के प्रकाशन विषयक विवरण को प्रस्तुत कर रहे हैं। व्यवहार भानु की अस्सी हजार प्रतियां प्रकाशित की गई थीं। दैनिक यज्ञ प्रकाश पुस्तक की साठ लाख प्रतियां सार्वदेशिक सभा की सार्वदेशिक प्रेस सहित विभिन्न प्रकाशकों और विभिन्न नामों से छप कर घर-घर पहुंचाई गई हैं। हमें लगता है कि इस विवरण को आर्यसमाज के सभी अनुयायियों को जानना चाहिये। अतः हम इन दोनों पुस्तकों के प्रकाशन विषयक विवरण को इस लेख में प्रस्तुत कर रहे है।
व्यवहार भानु पुस्तक को बाबू शेरसिंह जी से ब्याज रहित ऋण प्राप्त कर आचार्य चतुरसेन गुप्त जी द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक में बाबू शेरसिंह जी का चित्र प्रकाशित किया गया था। पुस्तक की बिक्री से जो धन प्राप्त हुआ था उस धन से ऋण लौटा दिया गया। इस प्रकार से आचार्य जी ने अनेक ग्रन्थों का प्रकाशन किया। ऋण लेकर पुस्तक का प्रकाशन करना तथा पुस्तक में ऋण्दाता का चित्र प्रकाशित करने का यह प्रयोग सफल रहा था। यदि वह ऐसा न करते तो यह व्यवहारभानु पुस्तक और अन्य ग्रन्थ प्रकाशित न हो पाते।
आचार्य चतुरसेन गुप्त जी के जीवनवृत्त में व्यवहारभानु के प्रकाशन से सम्बन्धित विवरण में बताया गया है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थप्रकाश के पश्चात् जनता के आचार-व्यवहार सुधारार्थ ‘‘व्यवहारभानु” नाम से एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी थी। गुप्त जी ने अपने मित्रों का ध्यान इस ओर खींचा कि इस पुस्तक को लिखे हुए 80 वर्ष हो गये हैं। अब तक यह पुस्तक करोड़ों की संख्या में छपनी चाहिये थी, जिससे चरित्र निर्माण की समस्या स्वमेव सुलझ जाती किन्तु ऐसा नहीं हुआ। गुप्त जी ने सुझाव दिया कि उस वर्ष होली पर्व तक ‘‘व्यवहारभानु” का केवल लागत मूल्य पर कम से कम 80 हजार का संस्करण प्रकाशित कर घर-घर में, स्कूल-कालेजों में तथा सर्व साधारण जनता में प्रचारार्थ दिया जाय। गुप्त जी के अनुरोध पर प्रकाशन का समस्त भार बड़ौत (उत्तर प्रदेश) के श्रद्धेय बाबू शेरसिंह जी ने अपने ऊपर ले लिया। इस प्रकार ‘‘व्यवहारभानु” एक बार मे अस्सी हजार प्रकाशित होकर आर्य जगत् में प्रचारित हुई।
‘दैनिक यज्ञ प्रकाश’ के प्रकाशन व इस पुस्तक की प्रकाश्य संख्या के विषय में विवरण प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि आचार्य चतुरसेन गुप्त जी के परम मित्र पं. देवव्रत धर्मेन्दु आर्योपदेशक जी, जो प्रायः प्रतिदिन सायंकाल घर आते थे और आर्यसमाज की गतिविधियों पर चर्चा किया करते थे, गुप्त जी ने एक दिन ‘‘दैनिक यज्ञ प्रकाश” की पुस्तक जो पहले से तैयार कर रखी थी, पण्डित जी को देकर कहा--पण्डित जी! इस पुस्तक को आज घर पर बैठकर देखिये। आपने हजारों परिवारों में यज्ञ करवाये हैं। इसमें यदि कोई संशोधन करना हो तो, करके कल मुझे वापिस कर देवें। साथ ही पांच सौ रुपये भी लेते आवें। इस पुस्तक को आपके नाम से छापा जायेगा। पुस्तक बिक जाने के बाद आपकी पूरी रकम आपको वापिस कर दी जायेगी और यह पुस्तक छपती रहेगी। परमात्मा ने चाहा तो यह पुस्तक लाखों घरों में जायेगी और साथ में आपका नाम भी। पण्डित जी इस योजना से बड़े प्रसन्न हुए और अगले ही दिन प्रातः पुस्तक और पांच सौ रुपये लेकर आ गए। दैनिक यज्ञ प्रकाश छपने लगी और शायद दुनिया के सारे रिकार्ड टूट चुके हैं। आज तक लगभग साठ लाख दैनिक यज्ञ प्रकाश (विभिन्न प्रका्रशकों और विभिन्न नामों से) छप कर, घर-घर जा चुकी है।
इसी प्रकार प्रजा-पालन, ऋषि की न सुनने का फल, खान-पान, ऋषि की सुनो आदि अनेक छोटी-छोटी पुस्तकें पण्डित जी के सहयोग से प्रकाशित हुईं। आचार्य चतुरसेन गुप्त की सूझ-बूझ से पण्डित जी यश के भागी बने और संस्था को वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ।
‘‘लाला चतुरसेन गुप्त: व्यक्तित्व एवं कृतित्व” पुस्तक में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जिन्हें पढ़कर पाठक आनन्द विभोर होते हैं व प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। हम आशा करते हैं कि उपर्युक्त दो प्रसंगों को पढ़कर भी हमारे सभी मित्र लाभान्वित होंगे। हम यह भी बता दें कि आचार्य चतुरसेन गुप्त जी ने अपने जीवन में लगभग 100 छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखीं। आचार्य जी ने अपनी मृत्यु से दो माह पूर्व एक पुस्तक ‘महान् आर्य (हिन्दू) जाति मृत्यु के मार्ग पर’ पर लिखी थी। यह पुस्तक क्रान्तिकारी पुस्तक सिद्ध हुई। दो माह में ही इस पुस्तक के तीन संस्करण प्रकाशित किये गये थे। इसी पुस्तक को श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने भी हिण्डोन सिटी से अपने प्रकाशन संस्थान ‘घूडमल प्रह्लादकुमार आर्य धर्मार्थ ट्रस्ट’ से सन् 2005 में प्रकाशित किया था। आचार्य जी की 40 प्रतिनिधि पुस्तकों व लेखों आदि का एक संकलन ‘कल निर्धन आज धनवान’ नाम से आपके सुपुत्र श्री मूलचन्द गुप्त जी द्वारा ‘ओम् प्रतिष्ठान, कुसुमालय, बी-1/27, रधुनगर, पंखा रोड, नई दिल्ली-110045’ से सन् 2015 में प्रकाशित किया है। यह पुस्तक भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस पुस्तक का भी जन-जन में प्रचार होना चाहिये। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
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