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जैव विविधता संरक्षण से ही सतत विकास का मार्ग प्रशस्त - प्रो सारंगदेवोत

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08 Feb 26
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जैव विविधता संरक्षण से ही सतत विकास का मार्ग प्रशस्त - प्रो सारंगदेवोत

उदयपुर। जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के भूगोल विभाग द्वारा तरुण भारत संघ एवं जल बिरादरी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (चतुर्थ जल कॉन्क्लेव) का समापन रविवार को गंभीर विमर्श, व्यावहारिक सुझावों एवं सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। सम्मेलन का विषय 
“अरावली पर्वतमाला की पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता”  रहा, जिस पर देश-विदेश के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों एवं जल संरक्षण कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रखे।

समापन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो कर्नल एस.एस. सारंगदेवोत ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह उपस्थित रहे। सम्मेलन के समन्वयक, भूगोल विभागाध्यक्ष एवं आईक्यूएसी निदेशक प्रो युवराज सिंह राठौड़ ने सम्मेलन की समग्र रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया कि इस कॉन्क्लेव में अरावली संरक्षण से जुड़े नीतिगत, वैज्ञानिक एवं सामुदायिक पहलुओं पर सार्थक संवाद हुआ।

कुलपति प्रो. कर्नल एस.एस. सारंगदेवोत ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि अरावली पर्वतमाला केवल प्राचीन पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिक जीवनरेखा है। अरावली क्षेत्र की जैव विविधता
वन, वन्यजीव और पारंपरिक पारिस्थितिकी , जलवायु संतुलन, वर्षा-जल संचयन और भूजल पुनर्भरण की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि अरावली के क्षरण का सीधा प्रभाव जल संकट, मरुस्थलीकरण और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में सामने आ रहा है।
उन्होंने विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आह्वान किया कि शोध को केवल अकादमिक मंचों तक सीमित न रखकर उसे नीति-निर्माण और जमीनी क्रियान्वयन से जोड़ा जाए। युवाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि जल, वन और जैव विविधता संरक्षण को जीवन मूल्य के रूप में अपनाने की आवश्यकता है। पारंपरिक जल संरचनाओं के संरक्षण और पुनर्जीवन से ही सतत विकास संभव है।

इस अवसर पर अतिथियों द्वारा कुलपति प्रो. कर्नल एस.एस. सारंगदेवोत द्वारा संपादित पुस्तक “स्वराज आदिज्ञान विरासत यात्रा” का विमोचन किया गया।

मुख्य अतिथि राजेंद्र सिंह ने कहा कि अरावली पर्वतमाला भारत की जल-संस्कृति की रीढ़ है। यदि अरावली सुरक्षित रहेगी तो नदियाँ, तालाब, कुएँ और मानव जीवन स्वतः सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान जल संकट पानी की कमी नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ टूटते संवाद का परिणाम है।

उन्होंने जोहड़, बावड़ी, तालाब जैसी पारंपरिक जल संरचनाओं की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि यही संरचनाएँ सदियों से अरावली क्षेत्र में जल प्रबंधन का आधार रही हैं। आधुनिक विकास की दौड़ में इनकी उपेक्षा से भूजल स्तर तेजी से गिरा है। यदि समाज पुनः इन प्रणालियों को अपनाए और समुदाय आधारित जल संरक्षण को प्राथमिकता दे, तो जल संकट का समाधान संभव है।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि इंद्रा खुराना, अशोक खुराना, पुनीत कुमार सहित प्रो. पंकज रावल, डॉ. जयसिंह जोधा, डॉ. हिम्मत सिंह चुंडावत, डॉ. महेंद्र प्रताप सिंह झाला, नेहपाल सिंह विभिन्न डीन डायरेक्टर्स एवं सदस्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।


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