उदयपुर। भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के राष्ट्र निर्माण की सशक्त आधारशिला है। नई शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और आधुनिक तकनीक के समन्वय को शिक्षा व्यवस्था में पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान परंपरा जीवन, संस्कृति और राष्ट्र चेतना का आधार रही है, जिसे आज के समय में पुनः आत्मसात करना अत्यंत आवश्यक है।
यह विचार शिवसिंह सारंगदेवोत ने शुक्रवार को राजस्थान विद्यापीठ के संघटक माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय के शिक्षा संकाय द्वारा प्रतापनगर स्थित कुलपति सचिवालय में आयोजित भारतीय ज्ञान परम्परा - प्राचीन से आधुनिक शिक्षा तक, विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भारत सदैव ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म की भूमि रहा है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मबोध, अनुशासन, प्रकृति से जुड़ाव और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी समान महत्व दिया जाता था। गुरुकुल व्यवस्था में विद्यार्थी को जीवनोपयोगी शिक्षा दी जाती थी, जिससे वह शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सक्षम बन सके।
प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि भारतीय वैदिक शिक्षा प्रणाली “लाइफ लॉन्ग लर्निंग” अर्थात जीवन पर्यन्त सीखने की अवधारणा पर आधारित थी। वेद, उपनिषद, योग, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, भाषा विज्ञान और दर्शन जैसे विषय अनुभव आधारित पद्धति से पढ़ाए जाते थे। उन्होंने कहा कि आज विश्व जिन अवधारणाओं को आधुनिक शोध का परिणाम मान रहा है, उनके मूल तत्व भारतीय ज्ञान परंपरा में हजारों वर्षों पूर्व विद्यमान थे।
उन्होंने भारतीय तर्कशास्त्र, न्याय दर्शन और पाणिनि के व्याकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के विकास में भी प्रेरणास्रोत बन रही है। संस्कृत भाषा की वैज्ञानिक संरचना और भारतीय गणितीय पद्धति आज तकनीकी शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में एआई ने कार्यप्रणाली को सरल, त्वरित और प्रभावी बनाया है, लेकिन तकनीक तभी सार्थक है जब उसमें नैतिकता, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का समावेश हो। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, संस्कार और राष्ट्र भावना से भी जोड़े।
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा, कौशल विकास, योग, भारतीय दर्शन और मूल्यपरक शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। इससे शिक्षा अधिक व्यवहारिक, रोजगारपरक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनेगी।
प्रारंभ में निदेशक प्रो. सुनिता मुर्डिया ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि सेमीनार में राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश से 150 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। सेमीनार में भारतीय ज्ञान परंपरा, डिजिटल शिक्षा, एआई आधारित शिक्षण प्रणाली तथा मूल्य आधारित शिक्षा जैसे विषयों पर दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए प्रथम तकनीकी सत्र जिसमें प्रो. एम पी शर्मा, डॉ. अंशु माथुर, द्वितीय तकनीकी सत्र में डॉ. अमृता मेहता, डॉ. फरजाना इरफान ने भारतीय संस्कृति और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर विस्तृत चर्चा करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
पुस्तक का हुआ विमोचन - समारोह में अतिथियों द्वारा डॉ. अर्पिता मट्ठा द्वारा लिखित पुस्तक रसायन विज्ञान का मूल सिद्धांत का अतिथियों द्वारा विमोचन भी किया गया।
संगोष्ठी में प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. बलिदान जैन , प्रो. रचना राठौर , प्रो. अमी राठौड, प्रो. सुनीता मुर्ड़िया
डॉ ललित श्रीमाली, डॉ दर्शना दवे, डॉ. अर्पिता मट्ठा , डॉ. सरोज प्रजापत, ओजस्वी सारंगदेवोत, नलिनी चुंडावत, मोनिका शांडिल्य, डॉ भारती वर्मा, डॉ. कैलाश चंद्र चौधरी , डॉ. हरीश मेनारिया, डॉ. रेनू हिंगड, डॉ. हिम्मत सिंह चुंडावत, डॉ. हरीश चौबीसा सहित एकेडमिक एवं शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े विषय विशेषज्ञ एवं शोधार्थियों ने भाग लिया।
संचालन डॉ. अर्पिता मट्ठा, ओजस्वी सारंगदेवोत ने किया जबकि आभार डॉ. ललित कुमार श्रीमाली ने जताया।