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 विद्यापीठ के संस्थापक जनुभाई की 115वीं जयंती पर किया नमन

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16 Jun 26
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 विद्यापीठ के संस्थापक जनुभाई की 115वीं जयंती पर किया नमन

उदयपुर / जनुभाई केवल एक शिक्षाविद् नहीं थे, बल्कि लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, राजनीतिज्ञ, कवि थे वे शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम मानते थे। उन्होंने ऐसे समय में शिक्षा के प्रसार का अभियान चलाया, जब समाज का बड़ा वर्ग इससे वंचित था। आजादी के 10 वर्ष पूर्व लालटेन के माध्यम से मेवाड़ में शिक्षा की अलख जगाई। ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक केन्द्रों की स्थापना की। नयी शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों और जनुभाई के शैक्षिक विचारों के बीच सामंजस्य को आज के परिप्रेक्ष्य में रेखांकित करता है।
उक्त विचार मंगलवार को विद्यापीठ के संस्थापक मनीषी पंडित जनार्दनराय नागर की 115वीं जयंती पर मंगलवार  को प्रतापनगर स्थित आईटी सभागार में पुष्पांजलि एवं व्याख्यानमाला में जनुभाई एवं नयी शिक्षा नीति 2020 विषय पर आयोजित संगोष्ठी में कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने कही।
प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि शिक्षा को विद्या में बदलने की जरूरत है आज की शिक्षा सिर्फ ( सूचना )इन्फोर्मेशन  दे रही है, इसे नैतिक मूल्यों में बदलने की जरूरत है। जनुभाई शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार देना नहीं, बल्कि व्यक्ति में चरित्र निर्माण का मानते है हम ऐसी शिक्षा दे जिससे उनमें देवत्व जागृत हो। नागर का शिक्षा दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, नयी शिक्षा नीति-2020 भी विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा आधारित शिक्षण तथा कौशल उन्मुख शिक्षा पर बल देती है। जनुभाई ने जिन मूल्यों और आदर्शों को अपने जीवन में अपनाया, वे नयी शिक्षा नीति के उद्देश्यों के साथ पूरी तरह सामंजस्य स्थापित करते हैं।

शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का साधन नहीं , व्यक्ति, समाज के विकास का आधार - कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर

कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर ने कहा कि जनुभाई का जीवन शिक्षा, सेवा और राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने का साधन नहीं माना, बल्कि उसे व्यक्ति और समाज के विकास का आधार बताया। “जनुभाई ने जिस लोकमंगलकारी शिक्षा की परिकल्पना की थी, नई शिक्षा नीति-2020 उसी भावना को आगे बढ़ाती दिखाई देती है। यह नीति विद्यार्थियों में रचनात्मकता, नवाचार, नैतिक मूल्यों और रोजगारपरक कौशल के विकास पर विशेष बल देती है। आज आवश्यकता है कि हम जनुभाई के विचारों को आत्मसात करते हुए शिक्षा को समाज और राष्ट्र के विकास से जोड़ें।”
उन्होंने कहा कि जनुभाई ने शिक्षा के क्षेत्र में जो कार्य किया है वह अतुलनीय है, हम सोच भी नहीं सकते कि आजादी के पूर्व पांच कार्यकर्ता एवं 03 रूपये के बजट से इस संस्था की स्थापना की थी, आज वह 10 हजार विद्यार्थियों व  एक हजार कार्यकर्ताओं के साथ करीब कुल एवं विश्वविद्यालय के 80 करोड़ के सालाना बजट के साथ एक वटवृक्ष बन चुका है। हमने कई ऐसे आयाम स्थापित किए जो उनके सपनों में थे।

संचालन डॉ. कुलशेखर व्यास ने किया जबकि आभार डॉ. कौशल नागदा ने जताया।

जनुभाई को किया नमन:-

संगोष्ठी के पूर्व प्रतापनगर  परिसर में स्थापित जनुभाई की आदमकद प्रतिमा पर कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत , कुलाधिपति एवं कुल प्रमुख बीएल गुर्जर, पीठ स्थविर डॉ. कौशल नागदा, रजिस्ट्रार डॉ. तरूण श्रीमाली के सान्निध्य में तीनों परिसर के कार्यकर्ताओं ने पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हे सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया।  

इस मौके पर प्रो. मलय पानेरी, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. जीवनसिंह खरकवाल, प्रो. मंजू मांडोत,  परीक्षा नियंत्रक प्रो. पारस जैन, प्रो. युवराज सिंह राठौड, डॉ. धमेन्द्र राजौरा, प्रो.. अवनीश नागर, प्रो.. हेमेन्द्र चौधरी, डॉ. लीली जैन, प्रो. अमी राठौड़, प्रो. सुनिता मुर्डिया, प्रो. रचना राठौड़, प्रो. बीएल श्रीमाली, डॉ. सपना श्रीमाली, डॉ. गुणबाला आमेटा, डॉ. अपर्णा श्रीवास्तव, निजी सचिव केके कुमावत, जितेन्द्र सिंह चौहान, उमराव सिंह राणावत, डॉ. ओम पारीक, डॉ. जयसिंह जोधा, डॉ. धीरेन्द्र सिसोदिया, डॉ. मोहसीन छीपा, भगवती लाल श्रीमाली  सहित विद्यापीठ के डीन डायरेक्टर एवं कार्यकर्ताओं ने जनुभाई को पुष्पांजलि अर्पित करते हुए उनके द्वारा बताये मार्ग पर चलते हुए विद्यापीठ के उत्तरोत्तर विकास में सहयोग देने की शपथ ली।
 


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