नई दिल्ली। लोकसभा सांसद राजकुमार रोत द्वारा संसद में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में केंद्र सरकार ने कई ऐसे तथ्य स्वीकार किए हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि देश के केंद्रशासित प्रदेशों, विशेषकर दिल्ली, में निवास कर रहे आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति सरकार गंभीर नहीं है।
सरकार ने अपने लिखित उत्तर में स्वीकार किया है कि दिल्ली, चंडीगढ़ और पुडुचेरी में आज तक एक भी अनुसूचित जनजाति (ST) अधिसूचित नहीं है। अर्थात इन केंद्रशासित प्रदेशों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को स्थानीय स्तर पर अनुसूचित जनजाति के रूप में कोई संवैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं है।
सांसद राजकुमार रोत ने विशेष रूप से यह प्रश्न पूछा था कि क्या दिल्ली में पिछले लगभग 50 वर्षों से रह रहे जनजातीय समुदायों को चिन्हित कर उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने तथा आगामी जनगणना में उन्हें शामिल करने पर सरकार विचार कर रही है? इसके उत्तर में केंद्र सरकार ने साफ शब्दों में कहा कि ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। यह जवाब उन हजारों आदिवासी परिवारों की उम्मीदों पर पानी फेरने वाला है, जो दशकों से दिल्ली में निवास कर रहे हैं।
सरकार ने यह भी बताया कि अनुसूचित जनजाति घोषित करने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत होती है, जिसमें संबंधित राज्य/केंद्रशासित प्रदेश की सिफारिश, भारत के महापंजीयक (RGI), राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST), राष्ट्रपति की अधिसूचना तथा संसद द्वारा कानून में संशोधन आवश्यक होता है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब सरकार स्वयं कोई प्रस्ताव ही तैयार नहीं कर रही, तो यह प्रक्रिया शुरू कैसे होगी?
सरकार ने 2011 की जनगणना के अनुसार केंद्रशासित प्रदेशों में अनुसूचित जनजाति की आबादी का भी विवरण दिया है। इसके अनुसार जम्मू-कश्मीर में 12,75,106, लद्दाख में 2,18,193, अंडमान एवं निकोबार में 28,530, दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन एवं दीव में 1,93,927 तथा लक्षद्वीप में 61,120 अनुसूचित जनजाति की आबादी है। जबकि दिल्ली, चंडीगढ़ और पुडुचेरी में शून्य (कोई अधिसूचित ST नहीं) दर्शाया गया है। सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि नवीनतम आंकड़े अगली जनगणना के बाद ही उपलब्ध होंगे।
सरकार ने यह भी माना कि दिल्ली, चंडीगढ़ और पुडुचेरी में ST अधिसूचित नहीं होने के कारण वहां विधानसभा, नगरपालिकाओं और पंचायती संस्थाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण भी उपलब्ध नहीं है। यानी इन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदाय राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी वंचित हैं।
हालांकि सरकार ने यह बताया कि केंद्र सरकार की नौकरियों में अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण लागू है तथा जनजातीय कल्याण के लिए EMRS, पीएम जनमन, छात्रवृत्ति, NSTFDC सहित अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब दिल्ली जैसे केंद्रशासित प्रदेश में किसी भी समुदाय को ST के रूप में अधिसूचित ही नहीं किया गया है, तो वहां रहने वाले आदिवासी इन अधिकारों और स्थानीय प्रतिनिधित्व का लाभ कैसे प्राप्त करेंगे?
इस पर सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि केंद्र सरकार का यह जवाब बेहद निराशाजनक है। देश की राजधानी में दशकों से रह रहे आदिवासी परिवारों की पहचान और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके पास उन्हें ST का दर्जा देने का कोई प्रस्ताव तक नहीं है। यह आदिवासी समाज के प्रति सरकार की उदासीनता और संवैधानिक दायित्वों की अनदेखी को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि सरकार को तत्काल दिल्ली सहित सभी केंद्रशासित प्रदेशों में निवासरत आदिवासी समुदायों का सर्वे कर उनकी स्थिति का अध्ययन करना चाहिए तथा पात्र समुदायों को संविधान के अनुरूप अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की प्रक्रिया प्रारंभ करनी चाहिए, ताकि वे भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों से वंचित न रहें।