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"रामनवमी" का ऐतिहासिक महत्व - डॉ. श्रीनिवास महावर

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25 Mar 26
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"रामनवमी" का ऐतिहासिक महत्व - डॉ. श्रीनिवास महावर

उदयपुर  | जनमत मंच के तत्वाधान में "रामनवमी" का ऐतिहासिक महत्व पर वार्ता का आयोजन किया गया। 
रामनवमी के राष्ट्रीय पर्व पर जनमत मंच के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्रीनिवास महावर ने बताया की, हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन रामनवमी का त्योहार पुरे देश में हर्षोउल्लास से मनाया जाता रहा है । इस बार  मार्च 26  को रामनवमी के साथ दुर्गा अष्टमी भी मनाई  जाएगी । जहां दुर्गा अष्टमी की विशेष पूजा अर्चना होगी वहीं श्री राम का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन को रामजन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। राम जी के जन्म पर्व के कारण ही इस तिथि को रामनवमी कहा जाता है।
धरती पर असुरों का संहार करने के लिए भगवान विष्णु ने त्रेतायुग में श्रीराम के रूप में जन्म लिया था। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवनकाल में कई कष्ट सहते हुए भी मर्यादित जीवन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने विपरीत परिस्थियों में भी अपने आदर्शों को नहीं त्यागा।
 इस दिन विशेष रूप से भगवान राम की पूजा अर्चना के साथ- साथ कई तरह के आयोजन किए जाते है। वैसे तो पूरे भारत में भगवान राम का जन्मदिन उत्साह के साथ मनाया जाता है लेकिन खास तौर से श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में इस पर्व को बेहद हर्षोल्ललास के साथ मनाया जाता है। रामनवमी के समय अयोध्या में भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से भक्तगणों के अलावा साधु-संन्यासी भी पहुंचते हैं और रामजन्म का उत्सव मनाते हैं। 
 मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने बताया कि रामनवमी के दिन आम तौर पर हिन्दू परिवारों में व्रत-उपवास, पूजा पाठ व अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। राम जी के जन्म के समय पर उनके जन्मोत्सव का आयोजन किया जाता है और खुशियों के साथ उनका स्वागत किया जाता है। घर को पवित्र कर कलश स्थापना की जाती है और श्रीराम जी का पूजन कर, भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। इसी दिन विशेष तौर पर श्रीराम के साथ माता जानकी और लक्ष्मण जी की भी पूजा होती है। इस  दिन धार्मिक आस्था का केंद्र अयोध्या श्री राम मंदिर को भी सजाया जाता है एवं बड़ी मात्रा में श्रध्दालु एवं भक्त वहा दर्शन हेतु जाते है |
 मंच के सह सचिव डॉ. प्रियदर्शी ओझा ने बताया कि कैकयी द्वारा राम जी के पिता महाराजा दशरथ से वरदान मांगे जाने पर, श्रीराम ने राजपाट छोड़कर 14 वर्षों के वनवास को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया और वनवास के दौरान कई असुरों समेत अहंकारी रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। अयोध्या छोड़ते समय श्रीराम के साथ माता जानकी और भाई लक्ष्मण भी 14 वर्षों के वनवास गए। यही कारण है कि रामनवमी पर उनकी भी पूजा श्रीराम के साथ की जाती है।
मंच के सहायक सचिव विनोद कुमार चौधरी बताया कि अयोध्या के राजा बने भगवान राम अपने अनुकरणीय गुणों के लिए जाने जाते है। वे लोकप्रिय, वीर, दयालु, न्यायप्रिय, बुद्धिमान, धैर्यवान, प्रेममय, आज्ञाकारी और कर्तव्यनिष्ठ थे। भगवान राम की पूजा उनकी पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण और भक्त हनुमान के साथ की जाती है। भगवान राम की पूजा के साथ-साथ सूर्य देव की भी पूजा की जाती है, क्योंकि भगवान श्री राम इक्ष्वाकु वंश के थे। इक्ष्वाकु वंश को सौर या सूर्यवंश वंश के नाम से जाना जात है। राम नवमी के उत्सव में महान महाकाव्य रामायण का पाठ और राम लीलाओं का मंचन शामिल है, जो भगवान राम के जीवन की लीलाओं को दर्शाती हैं।
मंच के कोषाध्यक्ष विशाल  माथुर बताया कि यह त्योहार भगवान विष्णु के अवतार भगवान राम के जन्म का उत्सव है। 
कार्यक्रम का संचालन डॉ. पूनम पाठक द्वारा किया गया |
 


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