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’उदयपुर में राष्ट्रीय मत्स्य कृषक दिवस मनाया गया’

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11 Jul 26
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’उदयपुर में राष्ट्रीय मत्स्य कृषक दिवस मनाया गया’

उदयपुर।   राष्ट्रीय मत्स्य कृषक  दिवस के अवसर पर संस्था मेवाड़ एंगलर्स सोसायटी एवं कॉलेज ऑफ फिशरीज’ के संयुक्त तत्वावधान में फतह सागर की पाल पर 10 जुलाई को जलीय जैव विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण जागरूकता कार्यक्रम एवं संगोष्ठी  का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के प्रारंभ में मेवाड़ एंगलर्स सोसायटी के अध्यक्ष गोवर्धन सिंह झाला ने समस्त आगंतुकों का स्वागत करते हुए सोसाइटी के कार्यकलापों की जानकारी साझा की एवं उदयपुर की झीलों के सौन्दर्य  एवं  संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।
मेवाड़ एंगलर्स सोसायटी के निदेशक डॉ. अतुल कुमार जैन ने अपने संबोधन में बताया कि उदयपुर की झीलों में पानी की गुणवत्ता लगातार बिगड़ती जा रही है जिस कारण जलीय जीवों एवं विशेषकर मछलियों के जीवन चक्र पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। झीलों का पानी आम नागरिकों के पीने के काम आता है इस कारण जन स्वास्थ्य की दृष्टि से इसका स्वच्छ रहना आवश्यक है।
सोसायटी के वरिष्ठ सदस्य जे.सी. विश्वास ने राष्ट्रीय मत्स्य कृषक दिवस की उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्ष 1957 में मत्स्य विज्ञानी डॉ. हीरा लाल चौधरी और डॉ. के एच अलीकुनी के अथक प्रयासों से उड़ीसा के कटक, अंगुल स्थित सेंट्रल इनलैंड फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट के पौंड कलचर डिविजन में 10 जुलाई 1957 को भारतीय मेजर कार्प रोहू और मृगल मछलियों के कृत्रिम प्रजनन कराने में सफलता प्राप्त की, जिससे मत्स्य कृषकों को मछली के बीज नदियों, नहरों, नालों से एकत्र करने की बाध्यता समाप्त हुई और प्रयोगशाला एवं हैचरी में मछली बीज पैदा करना संभव हो पाया। इसी दिन की याद में देश में राष्ट्रीय मत्स्य कृषक दिवस मनाया जाता है। मेवाड़ एंगलर्स सोसायटी के उद्देश्य एवं कार्य के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2009 में उदयपुर के कुछ जाने माने प्रबुद्ध नाकरिकों ने झीलों को साफ रखने में मछलियों के योगदान का ज्ञान जन जन तक पहुंचाने तथा पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण एवं लुप्त हो रही मत्स्य संपदा विशेष कर माहसीर को बचाने के उद्देश्य से मेवाड़ एंगलर्स सोसायटी का गठन किया।
फिशरीज कॉलेज के डीन डॉ. आर एल सोनी ने झील संरक्षण में जन साधारण की भागीदारी पर विस्तृत चर्चा करते हुए नागरिको से अपील की कि वे झील में ही नहीं बल्कि झील के आस पास भी सफाई का पूरा ध्यान रखें, झील किनारे पार्टियां, मनोरंजन कार्यक्रम आदि के बाद सामान्यतया लोग प्लास्टिक थैलियां, खाली डब्बे, बोतलें,  झूठन आदि वहीं छोड़ कर चले जाते हैं इसपर चिंता व्यक्त की एवं आहवान किया कि प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण की स्वच्छता का खयाल रखना चाहिए।
कॉलेज के पूर्व डीन डॉ. सुबोध शर्मा ने उपस्थित श्रोताओं को महसीर की संरचना, आहार व्यवहार एवं वैज्ञानिक जानकारी कराई। महासीर मछली की विभिन्न स्पेशीज के बारे में विस्तार से बताया। कवर्धा, छत्तीसगढ़ के फिशरीज कॉलेज के पूर्व डीन डॉ हेमेन्द्र कुमार वर्डिया ने जलीय पर्यावरण के संरक्षण पर विशेष जोर दिया एवं बताया कि यदि जलीय पारिस्थितिकी का संरक्षण नहीं किया तो कई प्रजातियों के जल जीव लुप्त हो जाएंगे। जैसे कि उदयपुर की झीलों से महासीर मछली लुप्त हो चुकी है। उन्होंने आहवान किया कि बड़ी के तालाब में जो महासीर मछली जीवित बची है उसका संरक्षण हर हाल में करना होगा।
मेवाड़ एंगलर्स सोसायटी के संस्थापक इस्माइल अली दुर्गा ने उदयपुर में पहली बार 2016 में महाशीर मछली के प्रजनन कराए जाने के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि महासीर मछली का कृत्रिम प्रजनन कराना कोई आसान काम नहीं है। ये मछली बहुत स्वच्छता प्रिय होती है। देश के लगभग सभी जलाशयों में इसका प्राकृतिक प्रजनन नहीं होने से वैज्ञानिकों एवं राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का कहना है कि इस मछली को बचाने के लिए इसका कृत्रिम प्रजनन करा कर बीज पैदा कर जलाशयों में छोड़ना अधिक आसान विधि है। उन्होंने बताया कि महासीर मछली का कृत्रिम प्रजनन कराने के लिए वन विभाग के सहयोग से वर्ष 2010 से लगा कर 2016 तक उदयपुर में महासीर मछली का कृत्रिम प्रजनन कराने का प्रयास किया गया और अक्टूबर 2016 में महासीर मछली का प्रजनन कराने में सफलता हासिल की गई।
संगोष्ठी में पूर्व आरएएस अधिकारी मोहम्मद यासीन पठान को मेवाड़ एंगलर्स सोसायटी का मानद सदस्य घोषित किया गया। संगोष्ठी का संचालन ताज होटल्स के प्रबन्ध से जुड़े वीरेंद्र सिंह चम्पावत ने किया। समापन पर मेवाड़ एंगलर्स सोसायटी के सचिव एवं मंत्री श्री सुहास मनोहर ने उपस्थित श्रोताओं एवं आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
गोष्ठी में फिशरीज कॉलेज के प्राध्यापकगण, विद्यार्थियों, ग्रीन पीपल सोसायटी के सदस्यगण, मत्स्य विभाग के वर्तमान व पूर्व अधिकारी कर्मचारी एवं नगर के कई प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।
 


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