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रोजगार के भंवर में उलझता युवा भविष्य

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24 Jul 26
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रोजगार के भंवर में उलझता युवा भविष्य

सत्य भूषण शर्माउदयपुर (राजस्थान)
 

आज का युवा सपनोंसंघर्षों और संभावनाओं का प्रतीक माना जाता है। उसके भीतर ऊर्जा हैप्रतिभा हैकुछ कर गुजरने का जज़्बा हैलेकिन विडम्बना यह है कि वही युवा आज बेरोजगारी के चक्रव्यूह में बुरी तरह फँसता जा रहा है। देश के करोड़ों शिक्षित युवक-युवतियाँ रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। उनके सपनों की उड़ान को परिस्थितियों ने जैसे कैद कर लिया हो।

सरकारें समय-समय पर रोजगार बढ़ाने के लिए नई योजनाएँ बनाती हैंरोजगार कार्यालय खोले जाते हैंयुवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के दावे किए जाते हैंपरन्तु जमीनी हकीकत इससे काफी अलग दिखाई देती है। नौकरी की तलाश में युवा कार्यालयों के चक्कर काटते रहते हैंप्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिता देते हैंफिर भी सफलता बहुत कम लोगों को मिल पाती है।

जब भी बेरोजगारी का विषय सामने आता हैतब हमारे मन में एक ऐसे युवा की तस्वीर उभरती है जो हाथों में फाइलें और प्रमाण पत्र लिएथका हुआपरेशान और उम्मीदों के सहारे एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक भटक रहा होता है। उसकी आँखों में सपने तो होते हैंलेकिन परिस्थितियाँ उन सपनों को बार-बार तोड़ देती हैं। समाज के लिए यह केवल एक आर्थिक समस्या नहींबल्कि मानसिकसामाजिक और नैतिक संकट भी बन चुकी है।

आज शिक्षा का स्वरूप भी चिंता का विषय बन गया है। महँगी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा। डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैंलेकिन अवसर सीमित होते जा रहे हैं। नौकरी पाने के लिए योग्यता के साथ-साथ धनसिफारिशजातीय समीकरण और संपर्कों का महत्व बढ़ता दिखाई देता है। जिन युवाओं के पास ये साधन नहीं होतेवे निराशा और हताशा का शिकार हो जाते हैं।

बेरोजगारी का सबसे खतरनाक प्रभाव यह है कि यह युवाओं को गलत रास्तों की ओर धकेल देती है। जब मेहनत और प्रतिभा को उचित अवसर नहीं मिलतातब कुछ युवा अपराधनशेहिंसा और अन्य गलत गतिविधियों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। यह केवल उस युवा की नहींबल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की हानि है।

सरकारें युवाओं को स्वरोजगार हेतु ऋण और योजनाएँ उपलब्ध कराती हैंलेकिन कई बार इन योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुँच पाता। लघु उद्योगों और छोटे व्यवसायों को पर्याप्त सहयोग न मिलने के कारण युवा आर्थिक रूप से मजबूत नहीं बन पाते। ऐसे में उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे टूटने लगता है।

यह समस्या केवल गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों तक सीमित नहीं रही। सम्पन्न परिवारों के युवा भी आज मानसिक दबावअसफलता और भविष्य की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। सपनों का टूटनाअपेक्षाओं का बोझ और लगातार असफलता व्यक्ति को भीतर से कमजोर कर देती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को रोजगार से जोड़ा जाएकौशल आधारित प्रशिक्षण को बढ़ावा मिलेउद्योगों और शिक्षा संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो तथा युवाओं को केवल डिग्री नहींबल्कि व्यवहारिक ज्ञान और आत्मविश्वास भी दिया जाए। यदि देश का युवा मजबूत होगातभी राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल बन सकेगा।

अंततः यही कहा जा सकता है कि बेरोजगारी केवल नौकरी न मिलने की समस्या नहींबल्कि टूटते सपनोंबिखरती उम्मीदों और संघर्ष करती युवा पीढ़ी की पीड़ा है। आवश्यकता इस बात की है कि समाजसरकार और व्यवस्था मिलकर युवाओं को सही दिशाअवसर और सम्मान प्रदान करेंताकि उनका भविष्य अंधकार में नहीं बल्कि सफलता और आत्मविश्वास की रोशनी में चमक सके।


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