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अहंकार से नहीं, भक्ति और विवेक से जीते जा सकते हैं मन: प्रशांत अग्रवाल

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07 Aug 26
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अहंकार से नहीं, भक्ति और विवेक से जीते जा सकते हैं मन: प्रशांत अग्रवाल

उदयपुर। नारायण सेवा संस्थान में सावन मास के अवसर पर आयोजित शिव कथा में भगवान शिव की भक्ति, समर्पण और अहंकार से मुक्ति का संदेश दिया गया। कथा में संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने महादेव के अनन्य भक्त रावण का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि रावण ने शिव की कठोर आराधना से अपार ऐश्वर्य और कीर्ति अर्जित की, लेकिन उसके भीतर का अहंकार अंततः उसके पतन का कारण बना।

अग्रवाल ने कहा कि एक बार रावण भगवान शिव की भक्ति के लिए कैलाश पर्वत पहुंचा। वहां नंदी ने उसे रोक दिया।

रावण अहंकारवश क्रोधित हो उठा। उस समय भगवान शिव समाधि में लीन थे।

अपनी शक्ति और सामर्थ्य के मद में रावण ने कैलाश पर्वत को उठाकर लंका ले जाने का प्रयास किया। उसके प्रयास से कैलाश डोलने लगा तो माता पार्वती चिंतित हुईं।

तब भगवान शिव ने रावण के अहंकार को शांत करने के लिए अपने पैर का अंगूठा कैलाश पर रखा, जिससे रावण पर्वत के नीचे दब गया। अग्रवाल ने कहा कि संकट की उस घड़ी में रावण को अपनी भूल का एहसास हुआ।

उसे समझ आया कि भगवान शिव को शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि भक्ति, समर्पण और प्रेम से प्रसन्न किया जा सकता है। इसके बाद उसने भगवान शिव की स्तुति में शिव तांडव स्तोत्र की रचना की।

उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे मुक्त किया। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग आज के जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है।

किसी व्यक्ति को अहंकार, दबाव या शक्ति के बल पर नहीं जीता जा सकता। विवेक, प्रेम, विश्वास और विनम्रता ही दिलों को जीतने का मार्ग हैं।

शक्ति का प्रदर्शन संबंधों में दूरी पैदा करता है, जबकि प्रेम और विश्वास व्यक्ति को अपनेपन से जोड़ते हैं। कथा के दौरान बड़ी संख्या में दिव्यांगजन एवं उनके परिजनों ने शिव भक्ति और कथा का श्रवण किया।

वातावरण शिवमय हो उठा और श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से कथा का आनंद लिया।

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