जनमत मंच के संस्थापक एवं अध्यक्ष डॉ. श्रीनिवास महावर ने बताया कि राजस्थान, जिसे वीरों की धरती कहा जाता है, भारत का सबसे बड़ा राज्य है,जो अपने गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और अद्वितीय परंपराओं के लिए जाना जाता है। राजस्थान दिवस मनाने की परंपरा 1949 से शुरू हुई थी और इसे मानने की तारीख प्रति वर्ष 30 मार्च थी। इसी दिन 1949 ई. में 19 रियासतों, और तीन ठिकानों (नीमराना , लावा और कुशलगढ़ ) को मिलाकर राजस्थान का गठन किया गया था।
लेकिन इस बार राजस्थान दिवस 19 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। क्योंकि इस दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (हिंदू नव वर्ष) है और इसके आधार पर ही राजस्थान दिवस मनाने का निर्णय लिया गया है। 2026 में राजस्थान दिवस का मुख्य राज्य स्तरीय समारोह जालोर में आयोजित किया जाएगा।
राजस्थान दिवस 2026 के प्रमुख कार्यक्रम:
* मुख्य समारोह (19 मार्च): जालोर में आयोजित होगा।
* राज्य स्तरीय कार्यक्रम (14-19 मार्च): जयपुर (अल्बर्ट हॉल और अन्य स्थान) में सांस्कृतिक संध्या और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां होंगी।
* अन्य गतिविधियां (15 मार्च): जयपुर में "विकसित राजस्थान रन" और दिल्ली के बीकानेर हाउस में कार्यक्रम।
* जनजातीय गौरव दिवस (16 मार्च): डूंगरपुर के बेणेश्वर धाम में।
* युवा शक्ति दिवस (17 मार्च): जयपुर में राज्य स्तरीय युवा सम्मेलन।
राजस्थान दिवस के मुख्य राज्य स्तरीय कार्यक्रम जयपुर के अल्बर्ट हॉल परिसर में आयोजित किए जाएंगे. यहां सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लोक कलाकारों के कार्यक्रम और प्रदेश की परंपरा व विरासत को दर्शाने वाले आयोजन होंगे। पर्यटन विभाग के अनुसार राजस्थान दिवस को लेकर जयपुर के अलावा जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, उदयपुर और अन्य शहरों में भी सांस्कृतिक कार्यक्रम, लाइट एंड साउंड शो, लोक नृत्य और पर्यटन से जुड़े आयोजन किए जा जाएंगे, विभाग की ओर से इस संबंध में रूपरेखा तैयार की जा रही है।
राजस्थान का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यः
राजस्थान का इतिहास शौर्य, बलिदान और संस्कृति का प्रतीक है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र राजपूतों के विभिन्न साम्राज्यों का हिस्सा था, जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों से अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष किया। मेवाड़, मारवाड़, जयपुर, बीकानेर, उदयपुर ,जैसलमेर और अलवर जैसी प्रमुख रियासतें अपने वीर योद्धाओं और अद्भुत प्रशासनिक प्रणाली के लिए प्रसिद्ध थी।
राजस्थान का इतिहास वीरता, साहस और स्वाभिमान की महान गाथाओं से भरा हुआ है। यह भूमि प्राचीन समय से ही वीर योद्धाओं की जन्मभूमि रही है। यहाँ के राजपूत शासकों ने अपने राज्य, धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए अनेक कठिन युद्ध लड़े और अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटे। इसलिए राजस्थान को वीरों की भूमि कहा जाता है।
राजस्थान के इतिहास में कई महान वीरों का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। महाराणा प्रताप उनमें सबसे प्रमुख हैं। उन्होंने मुगल बादशाह अकबर के सामने कभी हार नहीं मानी और अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए जीवन भर संघर्ष किया। हल्दीघाटी का युद्ध वीरता, साहस का सबसे बड़ा उदाहरण है।
इसी प्रकार पृथ्वीराज चौहान भी राजस्थान के महान वीर शासकों में से एक थे। वे अपनी बहादुरी, युद्ध कौशल और देशभक्ति के लिए प्रसिद्ध थे उन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए अनेक युद्ध लड़े और अपने साहस का परिचय दिया।
राजस्थान के इतिहास में राणा सांगा का नाम भी बहुत सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने कई शक्तिशाली शासकों के खिलाफ युद्ध किए साथ ही अपने साहस और नेतृत्व से लोगों को प्रेरित किया।
राजस्थान की वीरता केवल पुरुषों तक ही सीमित नहीं थी। यहाँ की महिलाओं ने भी अपने सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए महान कार्य किए। चित्तौड़गढ़ की रानी पद्मिनी और अन्य राजपूत रानियों ने अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए जौहर किया,
राजस्थान का इतिहास वीरता, बलिदान और स्वाभिमान की परंपरा से भरा हुआ है। यहाँ के वीरों की गाथाएँ एवं उनका साहस देश भक्ति और सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरणा देता है।
राजस्थान का एकीकरणः
राजस्थान का एकीकरण 18 मार्च 1948 से शुरू होकर 1 नवंबर 1956 तक कुल 7 चरणों में पूरा हुआ। इस प्रक्रिया में 19 रियासतों, 3 ठिकानों और केंद्र शासित प्रदेश अजमेर-मेरवाड़ा का विलय हुआ, जिसमें 8 वर्ष, 7 माह और 14 दिन लगे। सरदार वल्लभभाई पटेल ने एकीकरण में मुख्य भूमिका निभाई।
राजस्थान एकीकरण के 7 मुख्य चरण:
1. मत्स्य संघ (18 मार्च 1948): अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली का विलय।
2. पूर्व राजस्थान (25 मार्च 1948): कोटा, बूंदी, झालावाड़, टोंक, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, किशनगढ़ और शाहपुरा।
3. संयुक्त राजस्थान (18 अप्रैल 1948): पूर्व राजस्थान में उदयपुर (मेवाड़) का विलय।
4. वृहत् राजस्थान (30 मार्च 1949): संयुक्त राजस्थान में जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर का विलय। इसे 'राजस्थान दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
5. संयुक्त वृहत् राजस्थान (15 मई 1949): वृहत् राजस्थान में मत्स्य संघ का विलय।
6. राजस्थान संघ (26 जनवरी 1950): सिरोही (आबू-देलवाड़ा को छोड़कर) का विलय।
7. वर्तमान राजस्थान (1 नवंबर 1956): अजमेर-मेरवाड़ा, आबू-देलवाड़ा का विलय।
महत्वपूर्ण जानकारी
. राजधानी - जयपुर
. 1949 में राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित हीरालाल शास्त्री बने थे। उन्होंने 7 अप्रैल 1949 को मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।
कार्यकालः वे 7 अप्रैल 1949 से 5 जनवरी 1951 तक इस पद पर रहे।
अन्य जानकारी: हीरालाल शास्त्री एक स्वतंत्रता सेनानी और वनस्थली विद्यापीठ के संस्थापक थे।
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे।
नोट - यह ध्यान देने योग्य है कि वे राज्य के पहले मनोनीत मुख्यमंत्री थे, जबकि पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री टीका राम पालीवाल थे ।
. प्रथम राज्यपाल: गुरुमुख निहाल सिंह
* एकीकरण का श्रेय: सरदार वल्लभभाई पटेल
* एकीकरण की पृष्ठभूमि:IGNCA पर राजाओं द्वारा संघ बनाने के प्रयासों के साथ हुई थी।
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान राजस्थान में तीन ठकाने (नीमराना ,लावा, कुशलगढ़) और 19 रियासतें थीं, जिन्हें स्वतंत्रता के बाद भारत में शामिल करना एक चुनौती थी। सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में रियासतों का एकीकरण हुआ और 30 मार्च 1949 को राजस्थान को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया गया। इससे पहले इसे राजपूताना के नाम से जाना जाता था।
सांस्कृतिक विरासत:
राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत रंगीन और विविधतापूर्ण है। यहाँ की लोक कलाएं, लोक संगीत, नृत्य, हस्तशिल्प और खान-पान देश-विदेश में प्रसिद्ध है। घूमर, कालबेलिया, भवाई जैसे लोकनृत्य और मांड, पाबूजी की फड़, कावड़ गायन जैसी लोक संगीत शैलियाँ यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं। राजस्थान के किले, महल और हवेलियां जैसे आमेर किला, चित्तौड़गढ़ किला, जैसलमेर का सोनार किला, जोधपुर का मेहरानगढ़ किला आदि विश्व धरोहर का हिस्सा है।
इस प्रकार राजस्थान की लोक कला, संगीत और नृत्य उसकी संस्कृति को जीवंत बनती हैं और भारत में इसको अलग पहचान दिलाती है।
पुष्कर में स्थित ब्रह्मा जी का मंदिर दुनिया के बहुत कम ब्रह्मा मंदिरों में से एक है। यह मंदिर बहुत पवित्र माना जाता है और यहाँ हर साला मेला भी लगता है।
1. रणकपुर जैन मंदिर (पाली)
पाली जिले में स्थित रणकपुर जैन मंदिर अपनी सुंदर वास्तुकला और संगमरमर की नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। यह जैन धर्म का महत्वप स्थल है।
2. देलवाड़ा का जैन मंदिर (माउंट आबू)
माउंट आबू में स्थित देलवाड़ा का जैन मंदिर अपनी अद्भुत संगमरमर की नक्काशी और सुंदर कला के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह जैन धर्म के पवित्र स्थलों में से एक है।
इस प्रकार राजस्थान के मंदिर और तीर्थ स्थल लोगों की आस्था, श्रद्धा और धार्मिक परंपराओं को दर्शाते है। ये स्थान न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि पर्यटन के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक राजस्थान की संस्कृति और आध्यात्मिकता का अनुभव करते है।
खान-पान और अतिथि सत्कार):-
राजस्थान का खान-पान उसकी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ के भोजन में स्वाद, परंपरा और स्थानीय परिस्थितियों का मिश्रण दिखाई देता है। राजस्थान का अधिकांश क्षेत्र रेगिस्तानी होने के कारण यहाँ ऐसे व्यंजन बनाए जाते हैं जो लंबे समय तक सुरक्षित रह सकने वाले कम पानी में तैयार होते हैं। इसलिए यहाँ के खाने में मसालों और घी का अधिक उपयोग किया जाता है।
यहाँ के लोग अपने मेहमानों को स्वादिष्ट भोजन खिलाते हैं और उनका पूरा ध्यान रखते हैं। वे मानते हैं कि "अतिथि देवो भव" अर्थात अतिथि भगवान के समान होता है।
इस प्रकार राजस्थान का स्वादिष्ट खान-पान और आदरपूर्ण अतिथि सत्कार उसकी संस्कृति की एक सुंदर पहचान है, जो लोगों के दिलों में स्थान बनाती है।
(राजस्थान में शिक्षा का महत्व):
राजस्थान के विकास और प्रगति में शिक्षा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाती हैं शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है, अच्छे-बुरे का अंतर समझता है और समाज के लिए उपयोगी नाम बनता है।
राजस्थान जैसे बड़े राज्य में शिक्षा का महत्व और भी अधिक है, क्योंकि यहाँ के कई क्षेत्र पहले शिक्षा से काफी दूर थे । लेकिन सरकार के प्रयासों से शिक्षा का प्रसार तेजी से बढ़ता गया। गाँवों और शहरों में कई स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय खोले गए है, जिससे पढ़ने के अधिक अवसर मिल रहे है।
शिक्षा के कारण लोगों में जागरूकता बढी है और वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझने लगे हैं।इससे समाज में कुरीतियों को कम करने में भी मदद मिलि है।विशेष रूप से बालिका शिक्षा पर भी राजस्थान में अधिक ध्यान दिया गया।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि शिक्षा राजस्थान के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए बहुत आवश्यक है। शिक्षा से ही राज्य और देश का उज्ज्वल भविष्य बनाया जा सकता है।
राजस्थान की शिक्षा नगरी (शिक्षा के प्रमुख स्थान):
राजस्थान में शिक्षा के प्रमुख केंद्र (शिक्षा नगरी) के रूप में कोटा सबसे प्रसिद्ध है, जिसे कोचिंग हब माना जाता है। इसके अलावा, सीकर (सरकारी रैंकिंग में शीर्ष), जयपुर (शैक्षणिक केंद्र), झुंझुनू (उच्च साक्षरता दर), जोधपुर, कुचामन, और अजमेर , उदयपुर भी प्रमुख शैक्षिक हब के रूप में उभरे हैं।
* कोटा: इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं (IIT, NEET) की कोचिंग के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध।
* सीकर: नवीनतम शिक्षा विभाग की रैंकिंग में राज्य में नंबर 1, जो उत्कृष्ट स्कूली शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए जाना जा रहा है।
* जयपुर: उच्च शिक्षा, सरकारी नौकरियों की तैयारी और प्रमुख विश्वविद्यालयों का हब।
* झुंझुनू: साक्षरता में अग्रणी और बेहतरीन स्कूलिंग के लिए प्रसिद्ध।
* अजमेर: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और अच्छी स्कूली शिक्षा के लिए।
हालिया रैंकिंग में सीकर, झुंझुनूं, हनुमानगढ़ और करौली जैसे जिलों ने भी शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन किया है।
पर्यटन और अर्थव्यवस्थाः
राजस्थान पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। यहां का मरुस्थलीय परिदृश्य, ऐतिहासिक इमारतें, वन्यजीवन और मेलों का आकर्षण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है। जयपुर,उदयपुर, जोधपुर, जैसलमेर और माउंट आबू पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण हैं। पर्यटन के अलावा, राजस्थान की अर्थव्यवस्था कृषि, खनिज, हस्तशिल्प और कपड़ा उद्योग पर आधारित है।
मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने राजस्थान दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि , राजस्थान दिवस न केवल ऐतिहासिक घटनाओं की याद दिलाता है, बल्कि यह राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और गौरव को भी मनाने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन पूरे राज्य में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, परेड, संगीत और नृत्य प्रदर्शन आयोजित किए जाते है। जयपुर और अन्य प्रमुख शहरों में विशेष आयोजन होते हैं, जिनमें राजस्थान की परंपराओं को दर्शाया जाता है।
अंत में कहा जा सकता है कि राजस्थान अपनी समृद्ध संस्कृति, गौरवशाली इतिहास और अद्भुत परंपराओं के कारण भारत का ए महत्वपूर्ण राज्य है। यहाँ की वीरता, त्याग और स्वाभिमान की गाथाएँ पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है। महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, राणा सांगा जैसे महान वीरों ने अपनी बहादुरी और देश भक्ति से राजस्थान का नाम इतिहास में अमर कर दिया।
राजस्थान की कला, लोकसंगीत, लोकनृत्य, रंग-बिरंगी वेशभूषा और पारंपरिक आभूषण इसकी संस्कृति को और भी आकर्षक बना देते है। भव्य किले, महल और हवेलियों इस राज्य की ऐतिहासिक धरोहर और गौरव को दर्शाती है। इसके अलावा यहाँ के प्रसिद्ध मेले, त्योहार , खान - पान और अतिथि सत्कार की परंपरा भी राजस्थान की विशेष पहचान है।
इस प्रकार राजस्थान वास्तव में भारतीय संस्कृति का सिरमौर है। इसकी समृद्ध परंपराएँ, ऐतिहासिक धरोहर की शान है। हमें इस अनमोल विरासत को संभालकर रखना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहिए ताकि वे भी सांस्कृतिक विरासत के धनी राजस्थान पर गर्व कर सकें। इसी कारण राजस्थान को भारत की संस्कृति का एक अनमोल रत्न और गौरवपूर्ण राज्य माना जात है।
National News
रजस्थान का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक महत्व -डॉ. श्रीनिवास महावर
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