उदयपुर, सूरजपोल दादावाड़ी में चल रहे आध्यात्मिक चातुर्मास के दौरान ज्ञान की अविरल गंगा प्रवाहित करते हुए विदुषी साध्वी डॉ. श्री विद्युतप्रभा श्रीजी म. सा. ने भगवान महावीर की देशना के माध्यम से जीवन में ज्ञेय, देय और उपादेय के महत्व को विस्तार से समझाया।

उन्होंने कहा कि हमें यह जानना आवश्यक है कि जीवन में क्या छोड़ना है, क्या करना है और क्या स्वीकार करना है।साध्वीश्री ने हाथ में कोयला और चंदन चूर्ण लेने का उदाहरण देते हुए कहा कि संसार पूरी तरह असार नहीं है, बल्कि इसमें सार भी विद्यमान है।

एक आत्मा तीर्थंकर गोत्र का बंध करती है, जबकि दूसरी आत्मा सातवीं नरक की ओर जाने का मार्ग चुन सकती है। इसलिए मनुष्य जीवन अत्यंत महत्वपूर्ण है।उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन एक ऐसे चैराहे के समान है, जहां हमारे सामने अनेक रास्ते होते हैं।

सही मार्ग हमें मंजिल तक पहुंचाता है, जबकि गलत रास्ता विपरीत दिशा में भटका देता है।

इसलिए परमात्मा से सदैव यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हमें सही मार्ग चुनने की शक्ति मिले।साध्वीश्री ने कहा कि अध्यात्म ही जीवन की वास्तविक मंजिल है, जबकि भौतिक क्षेत्र में कोई निश्चितता नहीं है।

परमात्मा का संदेश है कि आत्मा का स्वरूप और परमात्मा का स्वरूप मूल रूप से एक ही है। आवश्यकता केवल भीतर छिपे आनंद को प्रकट करने की है।

उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि परमात्मा के बताए मार्ग पर चलकर स्वयं को उनके जैसा बनाने का प्रयास करें।प्रवचन के दौरान गुरुवर्या ने कच्छ के देवजी भाई एवं नानजी भाई जैसे अचल गच्छीय श्रेष्ठ श्रावकों के विनयपूर्ण जीवन का उदाहरण दिया।

साथ ही विधिकारक बाबू भाई कड़ी वाले के सात्विक एवं धार्मिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि सहज रूप से प्राप्त होने वाली चीजों का हम अक्सर मूल्य नहीं समझते।उन्होंने कहा कि नवकार मंत्र हमें सहज मिला है, उसी प्रकार पानी और हवा भी सहज रूप से उपलब्ध हैं, लेकिन हमें इनकी वास्तविक कीमत और महत्व को समझना चाहिए।

जीवन में आत्मिक भावों को जागृत कर इन अनमोल उपलब्धियों के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए।इस अवसर पर माणिक्य स्वामी तप एवं आयंबिल तप के आराधकों की ट्रस्ट मंडल द्वारा अनुमोदना की गई।

चातुर्मास समिति ने आगामी धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों में अधिक से अधिक धर्मानुरागी श्रद्धालुओं से सहभागिता करने का आह्वान किया।