राजस्थान में लंबे समय से प्रतीक्षित नगरीय निकाय चुनावों की बुधवार को हुई घोषणा के साथ ही प्रदेश के शहरों की राजनीति एक बार फिर पूरी तरह चुनावी रंग में रंग गई है। राज्य निर्वाचन आयोग ने प्रदेश के 309 शहरी निकायों में चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया है। स्थानीय निकायों के इन चुनावों में राजस्थान की 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाएं शामिल हैं।
राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने बुधवार को जयपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी दी। राज्य के 10,245 पार्षदों के निर्वाचन के लिए दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को मतदान होगा, जबकि 14 सितंबर को मतगणना के बाद चुनाव परिणाम घोषित किए जाएंगे।
राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही प्रदेश के सभी 309 शहरी निकायों में तत्काल प्रभाव से आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है।
यह आचार संहिता चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक प्रभावी रहेगी। आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद नई घोषणाओं और नए विकास कार्यों पर स्वाभाविक रूप से अंकुश रहेगा।
हालांकि पहले से स्वीकृत और प्रारंभ हो चुके कार्य जारी रह सकेंगे। चुनावी माहौल में सरकार और स्थानीय निकायों की गतिविधियों पर भी निगाह रहेगी।
चुनाव कार्यक्रम के अनुसार स्थानीय निकाय चुनाव के लिए 27 अगस्त से नामांकन प्रक्रिया शुरू होगी और 3 सितंबर तक उम्मीदवार अपने नाम वापस ले सकेंगे। पार्षदों के निर्वाचन के बाद 21 सितंबर को नगर निगमों में महापौर, नगर परिषदों में सभापति तथा नगरपालिकाओं में अध्यक्ष का चुनाव होगा। इसके अगले दिन 22 सितंबर को उपमहापौर, उपसभापति और उपाध्यक्ष के चुनाव कराए जाएंगे।
राजस्थान में शहरी सरकारों के गठन के लिए स्थानीय निकाय चुनावों का महत्व केवल 10,245 पार्षदों के निर्वाचन तक सीमित नहीं है। प्रदेश के शहरों की स्थानीय सरकारें सीधे तौर पर नागरिकों के दैनिक जीवन से जुड़ी होती हैं।
सड़क, सफाई, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, सीवरेज, पार्क, यातायात, अतिक्रमण और नगरीय विकास जैसे मुद्दे आम मतदाता के लिए किसी भी बड़े राजनीतिक विमर्श से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
इसलिए इन चुनावों में स्थानीय समस्याएं और स्थानीय नेतृत्व निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
राजस्थान में स्थानीय निकायों के चुनावों में 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाएं के लिए वार्डों की आरक्षण लॉटरी पहले ही पूरी हो चुकी है।
ऐसे में राजनीतिक दलों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त उम्मीदवारों के चयन की है। भाजपा और कांग्रेस के साथ-साथ अन्य दलों तथा निर्दलीय उम्मीदवारों की सक्रियता भी आने वाले दिनों में बढ़ेगी।
कई वार्डों में टिकट वितरण ही चुनावी समीकरणों की पहली बड़ी परीक्षा साबित होगा।विशेष रूप से आरक्षित वार्डों में उम्मीदवारों के चयन के साथ-साथ स्थानीय सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत जनाधार और पिछले कार्यों का रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण रहेगा।
शहरी मतदाता अब केवल राजनीतिक दल के नाम पर मतदान नहीं करता; वह अपने वार्ड के प्रत्याशी की उपलब्धता, व्यवहार और समस्याओं के समाधान की क्षमता को भी परखता है।
इन चुनावों के परिणामों को राजस्थान की राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है। शहरों में किस दल को बढ़त मिलती है, कौन से स्थानीय मुद्दे प्रभावी रहते हैं और मतदाता किस प्रकार के नेतृत्व को प्राथमिकता देता है इन सबका असर भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों पर पड़ सकता है।
आखिरकार नगरीय निकाय चुनाव लोकतंत्र की सबसे निचली, लेकिन सबसे जीवंत इकाई का चुनाव हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनावों से अलग यहां मतदाता अपने आसपास के चेहरे और अपने मोहल्ले की समस्याओं को सामने रखकर फैसला करता है।
इसलिए इस बार राजस्थान के 309 शहरी निकायों का चुनाव केवल सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि शहरों के भविष्य और स्थानीय शासन की दिशा तय करने वाला जनादेश भी होगा।
राजस्थान में स्थानीय निकायों के चुनावों का काम पूरा होने के बाद पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव भी होंगे और इन चुनावों का कार्य नवम्बर तक पूरा होने की संभावना है ।
ऐसे में राजस्थान की राजनीति में अगले तीन माह शहरी और गाँवों की सरकारों के गठन के कार्य में व्यस्त रहेंगे ।