हाड़ोती में महिला रचनाकारों के सृजन का आज जबरदस्त अच्छा माहौल है। सभी विधाओं और अनेक विषयों पर पर खूब सृजन हो रहा है। कृतियों के प्रकाशन का सिलसिला भी गति पकड़ रहा है। समीक्षाएं भी चर्चा में हैं। देखा जाए तो महिला रचनाकार अधिक मुखर हो कर सामने आ रही हैं। सम्मेलन भी महिला रचनाकारों की शिल्पगत विशेषताओं, गद्य और पद्य विधाओं पर सार्थक चर्चाएं होंगी। सम्मेलन लेखिकाओं को सृजन के लिए और अधिक ऊर्जा प्रदान करेगा ऐसी उम्मीद है। इन्हीं में कोई महादेवी, अमृता प्रीतम निकलेंगी , इसके लिए जरूरी है गुणात्मक साहित्यिक सृजन पर ज्यादा ध्यान दिया जाए।
सृजनात्मक माहौल में तेजी लाने में हाड़ोती की 81 महिला रचनाकारों के साहित्यिक अवदान, सृजन की विधाएं और गहराइयां, प्रस्तुतीकरण, उद्देश्य, अनुभूतियां, संवेदनशीलता, शिल्प कौशल, सामाजिक परिवेश और संदर्भों का समावेश सभी को लेकर सामने आई पुस्तक "नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान" ने चेतना जागृति की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस पुस्तक के बारे में कथाकार और समीक्षक विजय जोशी कहते हैं कि सृजनकार की रचनाधर्मिता ने अपनी संवेदशीलता और अनुभूति से समकालीन सन्दर्भों को बखूबी रचित करते हुए जीवन की यात्रा में लोक-मंगल की भावना तथा इनकी कोमलता और अभिव्यक्ति की कलात्मकता को उजागर किया है। इन्हीं सन्दर्भों में नारी की रचनाधर्मिता ने उनकी कल्पनाशीलता और संवेदनशील प्रतिभा के विविध आयाम अपने रचनाकर्म में व्यक्त कर समकालीन धारा का बखूबी चित्रण ही नहीं किया है वरन् उसे अपनी मौलिक सोच और गहरी दृष्टि से अनुभवों के गलियारों में गहराई से परखा भी है।
हाड़ौती अंचल की महिला रचनाकारों का सृजन-संसार, जिसमें उन्होंने युग की धड़कन को सुना, समझा, परखा और उन्हें सार्वजनिक किया। यही नहीं उन्होंने समकालीन परिवेश के विविध पहलुओं को अपनी संवेदनाओं के सहारे सृजित कर वाणी भी प्रदान की। इन सबके चलते महिला लेखन को नवीन, अछूते और संवेदनामूलक आयाम मिले और यही सब कुछ उनके लेखन में उतर कर सामने आया। परिवर्तन के इस चक्र में मानवीय सम्बन्धों के बदलते संदर्भों का भी खुलासा इनके लेखन में दृष्टिगोचर हुआ । इससे महिला लेखन का मात्रात्मक ही नहीं गुणात्मक स्तर भी समृद्ध हुआ।
इन सभी सन्दर्भों की गहरी विवेचना नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान में परिलक्षित होती है, जिसमें राजस्थान के साहित्यिक और सांस्कृतिक अंचल हाड़ौती (कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़) की महिला रचनाकारों की साहित्यिक भाव भूमि में विद्यमान रचनात्मक उर्वरकता की सौंधी गंध रचनाओं में गंधायमान है। इस सुगंध से गद्य और पद्य की विविध विधाएँ शैलीगत विशेषताओं के साथ ही नहीं वरन् अभिव्यक्ति की कौशलता से सराबोर हैं।
सृजन की इस विविधता में सामाजिक और पारिवारिक सन्दर्भ में विविध क्षेत्रों से जुड़ी सृजनशील और स्थापित महिला रचनाकारों के साथ-साथ नवोदित महिला रचनाकारों द्वारा सामाजिक सरोकारों से संदर्भित समकालीन परिवेश से संवेदित रचनाओं का लेखन कर अपनी अनुभूतियों को शब्दों के माध्यम से उकेरा है।
इन सृजनशील महिला रचनाकारों की कथा-कहानियों में जीवन और जगत में उभरते सामाजिक परिवेश के साथ नारी जीवन और उससे सम्बन्धित सामाजिक समस्याएँ और उनका समाधान उजागर होता है। इनके पात्रों में आत्म-मंथन बना रहता है। वे टूटते, बिखरते, छितरने के बजाय संघर्षरत रहते हैं, वे अन्याय के प्रति संघर्ष को दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए सफलता पाने में सक्षम होते हैं। यही नहीं उनके ये पात्र नारी उत्पीड़न के विरुद्ध स्वर ऊँचा करने में भी पीछे नहीं हैं।
सृजनशील महिला रचनाकारों की कविताएँ भारतीय सांस्कृतिक परिवेश को समेटे हुए सामाजिक शोषण के विरुद्ध मुखर होती हैं। यही नहीं काव्य की विविध विधाओं में उभरी काव्य रचनाओं में मानव-मन की कोमल अनुभूतियाँ और मनोवैज्ञानिक गहराई तो दृष्टिगोचर होती ही है, साथ ही सांस्कृतिक परिवेश का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से सामने आकर पाठक को अपने साथ यात्रा करवाता है। इनकी कविताओं में उदात्त प्रेम की सहज अभिव्यक्ति है तो अनुभवों का सजग चेतन स्वरूप भी सामने आता है। जीवन-दर्शन से संदर्भित इन कविताओं में सामाजिक चिंतन के विविध आयाम उभरे हैं तो सांस्कृतिक चेतना और संस्कारों के अटूट सम्बन्ध भी चित्रित हुए हैं।
गद्य की विविध विधाओं में सृजनरत इन महिला रचनकारों का गद्य लेखन विषयवस्तु के अनुरूप सामने आया है, वहीं परिवेशजन्य अनुभूतियाँ अपने शैल्पिक सौन्दर्य से उभरी हैं। भाषा, शैली के स्तर पर इन महिला रचनाकारों का लेखन सहज, सरल तो है ही साथ ही शिल्प और शैली के स्तर पर नवीन प्रयोग भी सामने आये हैं, यथा पाँच पंक्तियों में नौ शब्दों वाली सायली कविता ।
लेखक ने अपनी समीक्षात्मक दृष्टि, सर्वेक्षणात्मक कौशल और शोधात्मक वृत्ति के साथ इन सभी महिला रचनाकारों के लेखन को गहन अध्ययन और साक्षात्कार के माध्यम से उकेरा है। कदाचित् इसीलिए इन आलेखों में रचनाकारों के लेखन का आरम्भिक सन्दर्भ, लेखन पर प्रभाव, लेखन विधा, भाषा, शैली, विषयवस्तु, विशेषता, इनकी सामाजिक उपयोगिता, लेखन का मर्म और सृजन के सामाजिक सरोकारों का विश्लेषण रचनात्मक अवदान के साथ गहनता से उभर कर सामने आया है।
अपनी अंतर्दृष्टि से रचनाओं का समुचित उल्लेख करते हुए प्रत्येक लेखिका के रचनात्मक भावों को उकेरा है। वहीं रचना के भीतर के तत्वों को विश्लेषित करते हुए उसके मर्म को उजागर किया है। यही नहीं प्रत्येक महिला लेखक के समूचे कृतित्व को अपनी समीक्षा पद्धति से सारगर्भित रूप में प्रस्तुत कर उनके व्यक्तित्व को संक्षेप में उभारा है तथा इन सभी लेखिकाओं को समकालीन सृजन सन्दर्भों के समक्ष प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत कर सृजन परिवेश को समृद्ध किया है।
यह कृति समकालीन महिला लेखन सन्दर्भों में वह सृजनात्मक पड़ाव है, जो आने वाले समय में हाड़ौती अंचल की महिला लेखन की पूर्व पीठिका निर्मित करता है। इस माने में भी कि अपने सृजनात्मक व्यक्तित्व-कृतित्व से सृजन को समृद्ध करती वरिष्ठ लेखिकाओं के साथ नवोदित रचनाकारों की एक समृद्ध पीढ़ी यहाँ रचनात्मक संस्कारों के पल्लवन में समर्पित भाव से रचनात्मक पहल करती हुई दिखाई देती है, जो अपनी अनुभूत सूक्ष्म संवेदनाओं से रचना-सूत्र पिरोकर साकार हुई रचना की सामाजिक एवं रचनात्मक सौद्देश्यता भी चरितार्थ कर रही हैं।