GMCH STORIES

’आक्रान्ता मुगलों पर विजय का प्रतीक था हल्दीघाटी युद्ध’

( Read 1667 Times)

16 Jun 26
Share |
Print This Page
’आक्रान्ता मुगलों पर विजय का प्रतीक था हल्दीघाटी युद्ध’

उदयपुर। हमारे यहां इतिहास लेखन में बहुत त्रुटियां हुई है। सच को झुठलाते हुए इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। यह विडम्बना ही है कि आजादी के बाद पाठ्यक्रमों में भी भारत का इतिहास इसी का शिकार रहा। मैं शिक्षक रहा हूं और शोधार्थी भी। इसलिए जब इतिहास की गहराई में गया तो बहुत सी कड़वी सच्चाईयां पता चली। दरबारी इतिहासकारों ने जो लिखा, उसी आधार पर हमारे यहां विद्यालयों में “अकबर महान“ पढ़ाया जाने लगा था। राजस्थान के शिक्षा मंत्री के रूप में जब काम करने का अवसर मिला तो मैने इसे बदलते हुए “महाराणा प्रताप महान” पढ़ाने की शुरूआत की। पूरे तथ्यों के साथ इस बात को हमने अपनी पाठ्य पुस्तकों में प्रमाणित किया कि हल्दी घाटी का युद्ध और बाद में दिवेर के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगलों को स्थाई रूप से मेवाड़ से खदेड़ दिया था।
महाराणा प्रताप की विजय पर जो लोग प्रश्न उठाते हैं, उन्हें इस बात को जानना चाहिए कि दरबारी इतिहासकारों ने ऐतिहासिक घटनाक्रमों की बजाय प्रशस्ति गान किया है। इसमें कपोल-कल्पनाएं करते हुए तत्कालीन शासक को प्रसन्न करने के लिए गाथाएं गढ़ ली गई है। यह ऐतिहासिक सत्य है कि अकबर इस बात को जानता था कि महाराणा प्रताप को सीधे लड़ाई में कभी हराया नहीं जा सकता है। दरबारी इतिहासकार भी इस बात को जानते हैं, इसलिए प्रताप की वीरता को उन्होंने अस्वीकार नहीं किया है। असली बात यह है कि अकबर चाहता था कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप को बंदी बना लिया जाए और फिर मार दिया जाए ताकि पूरे हिन्दुस्तान में उसके विरोध के एकमात्र कारण को ही समाप्त कर दिया जाए। इसलिए उसने आमेर के राजा मानसिंह को सेनापति चुना और हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप को बंदी बनाने भेजा। मुगलों की भारी-भरकम सेना के आगे महाराणा प्रताप की सेना बहुत ही कम थी, पर फिर भी महाराणा प्रताप ने अदम्य वीरता का परिचय देते हुए हल्दीघाटी का युद्ध जीता।
इतिहास की घटनाओं पर गौर करें, तो हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को हुआ। अकबर की ओर से मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के राजा मान सिंह (प्रथम) ने किया। महाराणा प्रताप स्वयं अपने भाई शक्ति सिंह, हकीम खान सूरी आदि के साथ युद्ध में डटे हुए थे। मुगलों की सेना लगभग एक लाख के करीब थी जबकि महाराणा प्रताप के पास मात्र बीस हजार से पच्चीस हजार सैनिक थे। महाराणा जानते थे कि युद्ध में इस बहुत कम सेना से मुगलों को हराना आसान नहीं है, इसलिए उन्होंने छापामार युद्ध और कूटनीति का सहारा लिया। हल्दीघाटी की संकरी घाटियों में उन्होंने मुगलों को घेरने और भ्रमित करने के साथ डराकर छुपकर हमले किए। महाराणा की बड़ी शक्ति तब उनके साथी भील योद्धा थे। यह वह योद्धा थे जो पेड़ों और दुर्गम घाटियों, चट्टानों और पहाड़ियों में छुपकर वार करने में माहिर थे। उनके सहयोग से महाराणा प्रताप ने मुगलों की बड़ी सेना को घेर कर हमले किए। मुगल सेना थोड़े समय में ही उखड़ गई। पूरा हल्दीघाटी का मैदान रक्त से भर गया। एक तरह से रक्त की नदी बहने लगी थी। इसी कारण हल्दी घाटी को आज भी रक्ततलाई कहा जाता है।
हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने भी बहुत निर्णायक भूमिका निभाई। चेतक की भूमिका साहसिक, वफादारी से भरी और ऐतिहासिक थी। इतिहास के कुछ कथानकों में यह भी मिलता है कि युद्ध में चेतक के चेहरे पर हाथी का मुखौटा लगाया गया था, ताकि मुगल सेना के हाथियों को भ्रमित किया जा सके। युद्ध में एक अवसर वह भी आया जब चेतक ने अदम्य साहस दिखाते हुए मुगल सेनापति राजा मानसिंह के हाथी की सूंड पर अपने आगे के दोनों पैर रख दिए थे ताकि महाराणा प्रताप मानसिंह पर सीधा वार कर सकें।  इस दौरान मानसिंह के हाथी की सूंड में बंधी तलवार से चेतक का एक पैर बुरी तरह कट गया था। महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर पूरी ताकत से वार किया परन्तु शरीर पर कवच होने के कारण मानसिंह बच गया। लड़ाई में चेतक बुरी तरह से घायल हो गया। तीन पैरों पर गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, चेतक ने स्वामीभक्ति का परिचय देते हुए अपने स्वामी को सुरक्षित रखा और अपने प्राण त्याग दिए। महाराणा प्रताप की सेना के आक्रमण का वेग इतना तीव्र था कि मुगल सैनिक जान बचाकर बनास के दूसरे किनारे 10-15 किलोमीटर दूर तक भाग खड़े हुए। बहुत सुनियोजित तरीके से बाद में विजयादशमी को दिवेर में मुगल सेना पर महाराणा प्रताप ने निर्णायक आक्रमण किया और मेवाड़ से स्थाई रूप से मुगलों को खदेड़ दिया। इस युद्ध में अमर सिंह ने मुगल सेनापति पर भाले से इतना जोरदार प्रहार किया कि उसे भेदते हुए भाला जमीन में धंस गया। दिवेर युद्ध में  छत्तीस हजार की मुगल सेना ने महाराणा प्रताप और अमर सिंह के आगे आत्मसमर्पण कर दिया।
यह ऐतिहासिक तथ्य है। इससे भी यह प्रमाणित होता है कि युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने विजय के प्रतीक के रूप में एक साल तक ताम्रपत्रों के माध्यम से दान और भूमि का वितरण किया। यह कोई स्वतंत्र राजा ही तब कर सकता था। यह भी इतिहास की कुछ पुस्तकों में मिल जाएगा कि अपनी विशाल सेना के बावजूद महाराणा प्रताप को जब अधीन करने में अकबर असमर्थ रहा तो वह अपने सेनापतियों से बहुत नाराज हुआ था। उसने क्रोधित होकर अपने सेनापतियों, जिसमें राजा मानसिंह और आसफ खान प्रमुख थे,इन्हें अपने दरबार में आने से रोक दिया था।
हल्दीघाटी का युद्ध निर्णायक था। इसी युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगलों को यह अहसास करा दिया था कि वह उन्हें कभी अधीन नहीं कर सकते। एक भय उन्होंने मुगल सैनिकों में इसी युद्ध से पैदा किया कि महाराणा से युद्ध करने का अर्थ है, अपना रक्त बहाना। मैं यह मानता हूं कि हल्दीघाटी का युद्ध राजस्थान ही नहीं भारतीय इतिहास की अपूर्व गौरवगाथा है। महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध में अपने अदम्य साहस, वीरता और पराक्रम का ही प्रदर्शन नहीं किया बल्कि सूक्ष्म रणनीतिक सूझ से मेवाड़ की सदाकृसदा के लिए स्वाधीनता की राह प्रशस्त की थी।
 


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories :
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like