कुछ व्यक्तित्व केवल अपना जीवन नहीं जीते, वे एक संस्कृति का जीवन बन जाते हैं। उनके जाने से केवल एक परिवार नहीं रोता, बल्कि एक पूरा समाज अपने अतीत की धड़कनों को खो देने का अहसास करता है। राजस्थान के लोक संगीत और लोक संस्कृति के ऐसे ही महान साधक थे केशरी चंद मालू (के.सी. मालू), जिनके निधन के साथ राजस्थानी लोकसंगीत का एक स्वर्णिम अध्याय इतिहास बन गया।
उनका जाना केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं है, बल्कि उन हजारों लोकधुनों की स्मृतियों का मौन हो जाना है, जिन्हें उन्होंने अपने श्रम, साधना और समर्पण से नई पीढ़ियों तक पहुँचाया। जिस समय लोक संगीत आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खोता जा रहा था, उस समय के.सी. मालू ने उसे केवल बचाया ही नहीं, बल्कि विश्व के मंचों तक सम्मान के साथ पहुँचाया।
व्यावसायिक परिवार में जन्म लेने के बावजूद पिता का नेपाल में बहुत बड़ा कारोबार छोड़ उन्होंने लाभ-हानि के गणित से ऊपर उठकर लोक संस्कृति की सेवा को अपना जीवन बना लिया। वर्ष 1987 में स्थापित वीणा म्यूजिक केवल एक संगीत कंपनी नहीं थी, बल्कि राजस्थान की लोक विरासत का ऐसा घर बन गई जहाँ हजारों गीतों, कलाकारों और परंपराओं को नया जीवन मिला। आज “घूमर”, “चीरमी”, “कांगसियो” और अनगिनत राजस्थानी लोकगीत जिस लोकप्रियता के साथ घर-घर गूंजते हैं, उसके पीछे के.सी. मालू की दूरदृष्टि, मेहनत और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता थी।
उन्होंने पाँच हजार से अधिक लोकगीतों का संकलन, ध्वनिलिपि और ऑडियो रिकॉर्डिंग तैयार कर वह कार्य किया, जिसे सामान्यतः विश्वविद्यालय और बड़े सांस्कृतिक संस्थान भी वर्षों में नहीं कर पाते। उन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता के निजी संसाधनों से राजस्थान के लोकसंगीत का ऐसा दस्तावेज तैयार किया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर रहेगा।
के.सी. मालू केवल संगीत निर्माता नहीं थे, वे प्रतिभाओं के पारखी भी थे। उन्होंने सैकड़ों नवोदित कलाकारों को मंच दिया, उन्हें पहचान दिलाई और उनके जीवन में रोजगार तथा सम्मान के नए द्वार खोले। आज राजस्थान के अनेक प्रतिष्ठित लोक कलाकार उनके प्रति कृतज्ञ हैं क्योंकि उनके जीवन की पहली बड़ी पहचान वीणा म्यूजिक के माध्यम से ही बनी।
उनकी दृष्टि केवल रिकॉर्डिंग तक सीमित नहीं थी। उन्होंने लोक संस्कृति को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। सुर-संगम संस्थान की स्थापना कर देशभर में संगीत प्रतियोगिताएँ आयोजित कीं, हजारों युवाओं को भारतीय संगीत से जोड़ा, पाँच हजार युवतियों को घूमर का प्रशिक्षण दिलाया और लोक परंपराओं को उत्सव का स्वरूप दिया।
वर्ष 1987 में जयपुर में आयोजित ऐतिहासिक लता मंगेशकर नाइट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए आयोजित इस कार्यक्रम से एक करोड़ रुपये की राशि एकत्रित कर उन्होंने यह सिद्ध किया कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज सेवा का प्रभावी माध्यम भी हो सकती है।
के.सी. मालू की सबसे बड़ी उपलब्धियों में 221 राजस्थानी विवाह गीतों का विशाल संकलन भी शामिल है। हिन्दी, अंग्रेज़ी और राजस्थानी में प्रकाशित यह दो ग्रंथ तथा 24 ऑडियो-वीडियो सीडी केवल पुस्तकें नहीं, बल्कि राजस्थान की सामाजिक परंपराओं का जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज हैं। संभवतः विश्व में विवाह गीतों का इतना व्यापक और व्यवस्थित संकलन कहीं और उपलब्ध नहीं है।
संगीतकार नौशाद जैसे महान कलाकारों के साथ उनका जुड़ाव उनकी सांगीतिक दृष्टि की व्यापकता का प्रमाण था। उन्होंने बॉलीवुड की चमक-दमक के बजाय राजस्थानी लोकधुनों को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। यही कारण है कि राजस्थान की मिट्टी की सुगंध आज देश और विदेश में जिस आत्मीयता से महसूस की जाती है, उसमें उनका अप्रतिम योगदान है।
उनकी सांस्कृतिक सेवाओं को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी का “समग्र कला साधना पुरस्कार”, महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन का “डागर घराना अवॉर्ड”, यूनेस्को चेतना अवॉर्ड, राजस्थान गौरव अलंकरण तथा अनेक प्रतिष्ठित सम्मान उनके कार्य की सार्वजनिक स्वीकृति थे। राजस्थान सरकार द्वारा प्रदान किया गया सर्वोच्च नागरिक सम्मान “राजस्थान रत्न” उनके जीवन-संघर्ष और सांस्कृतिक योगदान का सर्वोच्च सम्मान था लेकिन किसी भी सम्मान से बड़ा सम्मान वह प्रेम है, जो उन्हें कलाकारों, संगीत प्रेमियों और राजस्थान की जनता से मिला। उनके लिए संगीत व्यवसाय नहीं, साधना था; संस्कृति प्रदर्शन नहीं, जीवन मूल्य थी; और कलाकार केवल गायक नहीं, बल्कि लोक आत्मा के संवाहक थे।
के.सी. मालू को राजस्थानी लोक संगीत-संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए राजस्थान सरकार ने सर्वोच्च सिविल अवार्ड ‘राजस्थान रत्न’ से सम्मानित किया गया था। के.सी. मालू ने पांच हजार से अधिक लोकगीतों की पांडुलिपि, ध्वनिलिपि तैयार कर उनकी ऑडियो रिकॉर्डिंग की। उन्होंने किसी सरकारी मदद के बिना अपने बलबूते पर राजस्थानी संगीत को देश-दुनिया में विख्यात करने में अभूतपूर्व भूमिका निभाने के साथ ही अनेक राजस्थानी लोक कलाकारों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उभारने तथा रोजगार दिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
वर्ष 1946 में सुजानगढ़ (चूरू) में जन्मे केशरी चंद मालू (के.सी.मालू ) ने अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. के साथ ही साहित्य रत्न और जैन सिद्धांत रत्न का अध्ययन किया। के.सी. मालू को राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की ओर से 'समग्र कला साधना अवॉर्ड' और महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन की ओर से 'डागर घराना अवॉर्ड' सहित कई पुरस्कार सम्मान भी मिल चुके है।
आज जब के.सी. मालू हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी बनाई हुई धुनें, उनके संरक्षित गीत, उनके प्रोत्साहित कलाकार और उनके सपनों से निर्मित सांस्कृतिक संसार उन्हें सदैव जीवित रखेंगे। राजस्थान की किसी भी लोकधुन में जब “घूमर” की ताल बजेगी, किसी विवाह में पारंपरिक गीत गूंजेंगे या कोई युवा कलाकार मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति देगा, तब कहीं न कहीं के.सी. मालू की साधना की प्रतिध्वनि सुनाई देगी।
राजस्थान ने आज केवल एक संगीत मर्मज्ञ नहीं खोया है, बल्कि अपनी लोक-सांस्कृतिक चेतना का एक महान प्रहरी खो दिया है।उनकी स्मृति को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उस लोक विरासत को संजोए रखें, जिसे बचाने के लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
राजस्थानी संगीत एवं लोक कलाओं की सेवा करने के साथ ही मालू अपने पैतृक गांव सुजानगढ़ 250 करोड़ रु की लागत से 300 पलंगों का एक अस्पताल बनाने में भी अहम भूमिका निभा अपनी जन्म भूमि के प्रति ऋण चुकाने के कार्य में जुटे हुए थे ।
के.सी. मालू स्वयं भले ही मौन हो गए हों, लेकिन उनकी संजोई हुई लोकधुनें आने वाली पीढ़ियों तक राजस्थान की आत्मा का संगीत बनकर गूंजती रहेंगी और उनके दोनों पुत्र हेमजीत मालू और प्रसन्नजीत मालू उनके अधूरे सपनों को साकार करने में कामयाब रहेंगे।