संस्कृत, बांग्ला कृतियों का हिंदी में अनुवाद, ढाका में हिंदी की सेवा और बाल साहित्य के क्षेत्र में बच्चों को साहित्य से जोड़ने में उल्लेखनीय कार्य कर अलग पहचान बनाने वाली रचनाकार डॉ.अपर्णा पांडेय का जन्म साहित्यिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक रूप से समृद्ध परिवार संस्कृत और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान आचार्य राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पिता लाल बिहारी द्विवेदी एवं माता कृष्णा देवी द्विवेदी के परिवार में चौथी पुत्री के रूप में 1970 में मैनपुरी, उत्तर प्रदेश में हुआ। विवाह के पश्चात 1988 में यह कोटा आ गई। आपने हिंदी और संस्कृत से स्नातकोत्तर की डिग्री और 'पुराणों में शुकदेव-एक समालोचनात्मक अध्ययन' विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आश्रम के वातावरण में पली-बढ़ी और संतों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इनके पिता उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध श्रीमद्भागवत कथा वाचक और ज्योतिष विद्या के प्रकांड विद्वान, प्रोफ़ेसर रहे हैं। आप 2011 में राजस्थान लोक सेवा आयोग से चयनित होकर शिक्षा विभाग में आई और वर्तमान में सैकंडरी विद्यालय, सुल्तानपुर में सेवारत हैं। आपने भारतीय विदेश सेवा में चयनित होकर 2013 से 2017 तक प्रतिनियुक्ति पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली द्वारा सांस्कृतिक प्रतिनिधि और हिंदी शिक्षक के रूप में ढाका में हिंदी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य किया। जहाँ इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र और आधुनिक भाषा इंस्टीट्यूट, ढाका विश्वविद्यालय में प्रथम हिंदी पीठ के रूप में भी कार्य किया और ढाका विश्वविद्यालय में (एकवर्षीय पाठ्यक्रम) शुरू किया।
रचनाकार हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं पर समान अधिकार रहती हैं। इन्होंने हिंदी भाषा में गद्य और पद्य विधाओं में संस्मरण, गीत ग़ज़ल, उपन्यास, निबंध, समीक्षाएं आदि लेखन के साथ-साथ संस्कृत और बांग्ला पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया। युवाओं को भारतीय भाषा, ज्ञान और संस्कृति से अवगत कराना और जिज्ञासा पैदा कर अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा भाव पैदा करना इनके लेखन का मूल उद्देश्य है। आप कथेत्तर विधा में हिन्दी के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित हैं।
आपका लेखन इनके भ्राता श्री आचार्य इच्छाराम द्विवेदी 'प्रणब' जी और पिता श्री आचार्य लाल बिहारी द्विवेदी के साहित्य से प्रेरित है। गोपाल दास नीरज, कुंवर बेचैन, राजेंद्र मिश्र, बच्चू लाल अवस्थी, राधा वल्लभ त्रिपाठी, आचार्य रमाकांत शुक्ल जैसे विख्यात संस्कृत के प्रकांड विद्वानों का घर पर प्रतिवर्ष संस्कृत शोध संगोष्ठियों में, काव्य गोष्ठियों में, हिंदी गोष्ठियों में आना-जाना होता था। अतः आध्यात्मिक और साहित्यिक वातावरण होने के कारण बचपन से ही लेखन में रुचि जागृत हुई। आपने आई. एम. पुणे, हरिहर आश्रम, कनखल, हरिद्वार, सर्वभाषा साहित्यकार कुंभ, अजमेर, पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय, अंतरराष्ट्रीय विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस, विश्व हिंदी परिषद् नई दिल्ली, आनंद, (गुजरात) आदि अनेक मंचों से अपने शोध पत्रों का प्रस्तुतिकरण कर चुकी हैं। आपने 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन मारीशस 2018 में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर वहाँ प्रसून जोशी अध्यक्ष- केंद्रिय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड, कुंवर बेचैन, अशोक चक्रधर जैसे ख्यातनाम साहित्यकारों से लेखन हेतु प्रेरणा प्राप्त की।
इन्होंने हिंदी के साथ-साथ संस्कृत में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। कॉलेज स्तर पर पाठ्यक्रमों में लगी हुई संस्कृत की पुस्तकों
मेघदूतम , सांख्यकारिका, श्रीमद्भागवतगीता एवं योग दर्शन का हिंदी में अनुवाद कर छात्रों के लिए सुगम बनाया है। मेघदूतम गीतिकाव्य काव्यानुवाद पर आचार्य अग्निमित्र शास्त्री लिखते हैं कि अनुवाद में हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की शास्त्रीय हिंदी के झलक प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होती है। निःसंदेह संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों का हिंदी अनुवाद जैसा कठिन कार्य इनकी हिंदी की महत्वपूर्ण सेवा है। उन्मेश, प्रवासी मन - काव्य संग्रह आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय भाव, पर्यावरण संरक्षण की मावनाओं से ओतप्रोत है। ढाका प्रवास के दौरान लिखी गई यह ऐसी कृति है जिसमें महिलाओं के मन में रूढ़िवादी सोच के प्रति तीव्र आक्रोश, तो उससे मुक्त होने की छटपटाहट भी दिखाई देती है। साथ ही कविताएँ उदात्त प्रेम की पक्षधर हैं, जो कण-कण में ईश्वरीय रूप को दृष्टिगत करती हैं। कवि, समीक्षक स्व. वीरेंद्र विद्यार्थी लिखते हैं कि आत्मा के चिर संतति' गीति-संस्कृति का प्रथम प्रस्फुटन जगत और जीवन का खूबसूरत दर्पण बन गया है। जिसके जूम लेंस में आलोकित अतीत रक्तरंजित इतिहास की कौन किरचें वर्तमान का भाष्य भविष्य की भव्यता सृष्टि का व्याकरण अपने को बार-बार निहारते, निखारते और पैनाते रहते हैं। बांग्ला भाषा के लेखक 'बंदे अली मियां' की पुस्तक 'प्रिय गल्प' कहानियों का हिंदी में अनुवाद किया। इन कहानियों का उद्देश्य बच्चों को प्राकृतिक परिवेश से जोड़ना उनकी बाल सुलभ कल्पनाओं को चित्रित करना है। युवावस्था के प्रेम पर आधारित दो उपन्यास 'तड़प' और 'दो मित्रों की कथा' लिखे हैं। विदेश प्रवास और हिंदी सेवा कृति में आपने अपने अनुभवों और संस्मरणों को खूबसूरती से लिपिबद्ध किया है। हाल ही में भीलवाड़ा की लेखिका श्रीमती शिखा अग्रवाल द्वारा इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद प्रकाशित हुआ है। वैचारिक पुष्प गुच्छ एवं समीक्षाएं (शोधपरक और मौलिक निबंध)
भी इनका मुख्य सृजन है।
आपको साहित्य के क्षेत्र में अनेक सम्मान और साहित्यिक प्रतियोगिताओं में पुरस्कार प्राप्त किए हैं। बांग्लादेश में भारत के राजदूत हर्षवर्धन श्रृंखला एवं डायरेक्टर जनरल (साउथ एशिया) द्वारा उत्कृष्ट कार्य हेतु प्रशस्ति पत्र से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी, जयपुर द्वारा बांग्ला भाषा की बाल कथाओं की कृति 'प्रिय गल्प' पर" रांगेय राघव पुरस्कार' से सम्मानित किया। भारतेंदु समिति, कोटा द्वारा 'साहित्य श्री' सम्मान, राजमाता शिवरानी देवी, कोटा, स्व. सुनील दत्त राज्यसभा सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री, सुश्री शबाना आजमी राज्यसभा सांसद, श्री एस. एन. थानवी, शिक्षा सचिव, राजस्थान आदि द्वारा उत्कृष्ट कार्य हेतु सम्मान प्राप्त किया। इन प्रमुख पुरस्कारों के साथ-साथ दो दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा आपको पुरस्कृत और सम्मानित किया गया है।