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पुस्तक समीक्षा :आस साधती संवेदनाएं -- डायरी

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15 Jul 26
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पुस्तक समीक्षा :आस साधती संवेदनाएं -- डायरी

किसी भी लेखक द्वारा अपनी दैनिक घटनाओं, अनुभवों और विचारों को कलात्मक और प्रभावशाली रूप में लिखा जाता है और वह प्रकाशित होकर पाठकों के सामने आती है, तो यह साहित्य विधा का रूप लेती है। ऐसी ही कथाकार और विजय जोशी की प्रथम डायरी" आस साधती संवेदनाएं " प्रकाशित हुई । कुछ दिन पूर्व किसी कार्यवश उनके आवास पर जाना हुआ तो यह डायरी मुझे सप्रेम भेंट की। विगत दो दिनों में फुर्सत के क्षणों में इसे अध्योपांत पढ़ा और इसका महत्व भी समझा। मेरे लिए डायरी पुस्तक को पढ़ने का प्रथम अवसर रहा ।
 वैसे महात्मा गांधी और हरिवंशराय बच्चन के बारे में सुना था कि वे दैनिक डायरी लिखते थे। सोशल मीडिया पर ओम नगर सहित कुछ  लेखकों  की डायरी की चर्चा देखी। जहाँ तक मेरी समझ है डायरी लेखन से बढ़ कर दूसरा कोई मित्र नहीं हो सकता हैं। पूरी सच्चाई से डायरी लिखने वाला रोज़ मर्रा की घटना, प्रसंग और इसी बातें भी लोग डायरी में लिखते हैं आदि  जिसे वह अपनी पत्नी और मित्र को भी नहीं बता सकते है। ऐसा करने से वह तनाव मुक्त भी हो जाते है और उन्हें आत्ममंथन अथवा आत्म विश्लेषण का अवसर भी मिलता है। लेखन से सोचने और विचारने की शक्ति का विकास भी होता है। डायरी लेखक जब प्रमुख सार्वजनिक बातों की पुस्तक प्रकाशित करता है तो वह पाठकों को दिशा बोध और कई प्रकार प्रेरणा प्रदान करती है।
 विजय जोशी ने अपने वर्ष 2021 से 2025 तक पांच वर्ष की  डायरी में अपने लेखन के सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भों को उजागर किया है। संवेदना से जुड़े ये संदर्भ लघु भी है और विस्तृत भी। कम शब्दों में अधिक बात कही गई है। सभी प्रसंग जस के तस हैं, अनावश्यक महिमा मंडन और आत्म प्रशंसा से पूरी तरह मुक्त। भाषा आम पाठक की समझ में आने वाली है।
  डायरी की शुरुआत वर्ष 2020 की 5 अप्रैल को लिखे ज्ञान के विश्वकोश शीर्षक से होती है जिसमें इन्होंने स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखित पुस्तक मेरा भारत अमर भारत के पृष्ठ12 - 13 पर उद्धत प्रसंग में रामायण और महाभारत के संदर्भ को छुआ है। यहां से डायरी की यात्रा 207 पेज पार कर 20 नवंबर 2025 को अनुभूति ....और....संवाद तक यात्रा पूरी करती है। इस अंतिम लेख में वे सदाफूली के संवाद करते दिखाई देते हैं। खाद्य जाल, अनोखी जीव प्रकृति, जल क्रीड़ा, पग बढ़ाओ,
सुयोग, अब वह अकेली नहीं दिखेगी, त्रिवेणी, काव्य रचनाओं में बोलती है इनकी संवेदनाएं।
   डायरी के पन्नों पर अखबारन के प्रसंग,  प्रकृति , हिंदी दिवस, देव उठनी एकादशी, साहित्यिक संदर्भ,जीवन दर्शन, बड़े लोगों से भेंट संस्मरण,बच्चों को नशे से दूर रखने की सीख, साहित्यकारों की स्मृतियां, इनकी कृतियां पर की गई समीक्षा, लोक पर्व सांझी, व्हाट्सएप भी भेजे गए चित्र, साहित्यिक और सम्मान समारोहों की चर्चा, नीलकंठ पक्षी, हिंदी का महत्व, जीवजगत, फेसबुक पर पलायन के बाद जैसे प्रसंग, साहित्यकारों से संवाद, पुस्तक लोकार्पण, जब किशनगढ़ शैली का चित्र पूर्ण कर रहे थे, परिचर्चा, गहन विमर्श और संवाद, रचनात्मक संदर्भ, रुचि और रुझान, शीर्षक, बहुत कम ऐसा होता है, दिवस और संयोग, पुस्तक और पाठ, जीवन के पड़ाव पर, वाद्य यंत्र कमायचा, पिछला सप्ताह, रचनात्मक व्यवहार, परिवार,  संस्कार और रचनात्मकता, वक्त की अदालत, प्रोत्साहन के पल, अनायास, पाठक, विद्या, सहभागिता की गरिमा, कथा - कहानी, युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व आदि के माध्यम से पाठकों के समक्ष अपनी आस साधती संवेदना शीर्षक को अपने विचारों और अभिव्यक्ति से साकार किया है। इस सब के माध्यम से लेखक ने किस प्रकार समाज के दर्पण को प्रस्तुत किया है इसे तो इस डायरी को पढ़ कर ही समझा जा सकता है। भावों का यह गुलदस्ता पाठक के लिए कई प्रकार प्रेरणा श्रोत साबित हो सकता हैं। संवाद, परिचर्चा, पठन पठान, रिपोर्टिंग आदि अनेक पहलू कुछ नया सीखने वालों के लिए पर्याप्त सामग्री है। सुझाव रहेगा कि डायरी लेखन में आगे आने वालों को इसे आवश्यक रूप से पढ़ना चाहिए।
     डायरी इतनी रुचिकर है कि दो दिन में अध्योपंत पढ़ डाली। सच कहूं तो मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। मैने स्वयं भी डायरी लिखता हूं , इससे नए विषय मिले और लेखन में निखार आएगा। पुस्तक का कवर पेज चित्रकार एवं कला समीक्षक चेतन औदिच्य
ने शीर्षक अनुरूप बनाया हैं जो अत्यंत आकर्षक है। 
    लेखक अपने लेखकीय "भावों का संसार" में लिखता है," अपने अनुभवों के साथ चिंतन-मनन करता हुआ व्यक्ति जब अपने आस -पास के रचनात्मक परिवेश के साथ आत्मसात् करता है तो जीवन और मूल्यों के प्रति उत्पन्न आस ही उसे संवेदना के उस स्तर के साथ मार्ग प्रशस्त करती हैं जहाँ साधन और साध्य समन्वित होकर उसको प्रेरित करते हैं और वह निरन्तर अपनी रचनात्मक यात्रा के साथ आगे बढ़ता रहता है। आगे बढ़ने की यही दृष्टि उसकी आस को साधती है और वह अपनी भाव संवेदनाओं की उर्वरा भूमि पर अपने कौशल से सृजनात्मक पौध विकसित करता है। यही पौध जीवन की वास्तविकताओं और मानवीय संवेदनाओं के विविध पक्षों से साक्षात्कार कराती है। साथ ही अपने परिवेश में उत्पन्न स्थितियों और परिस्थितियों में स्वयं को खोजने का अवसर भी प्रदान करती है।
इन्हीं सन्दर्भों को आत्मसात् करते हुए मैंने अपने सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन के विविध पक्षों को रेखांकित करते हुए उनमें संचारित भावों को उभारने का प्रयास किया।" एक फ्लैप पर प्रकाशक हिमांशु वर्मा लिखते हैं," कथेतर में प्रकाशित यह डायरी " आस साधती संवेदनाएं" साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों, विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए सार्थक और उपयोगी रहेगी।"लेखक ने पुस्तक को अपने माता - पिता को समर्पित किया है। उन सभी का आभार व्यक्त किया है जो जीवन यात्रा में जिन्होंने इनके सृजनात्मक पक्ष को दिशाबोध प्रदान करते हुए सदैव रचनात्मकता की ओर प्रेरित किया है। 

 


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