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सुविवि- महर्षि वेदव्यास जयंती एवं गुरुपूर्णिमा महोत्सव 

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28 Jul 26
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सुविवि- महर्षि वेदव्यास जयंती एवं गुरुपूर्णिमा महोत्सव 

उदयपुर। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय द्वारा मंगलवार को महर्षि वेदव्यास जयंती एवं गुरुपूर्णिमा महोत्सव का आयोजन विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती अतिथिगृह स्थित बप्पारावल सभागार में किया गया। कार्यक्रम का विषय “महर्षि वेदव्यास एवं भारत-भारती” था। इस पावन अवसर पर विश्वविद्यालय परिवार ने गुरु परंपरा और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर कैलाश डागा थे। अध्यक्षता विश्वविद्यालय सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो नीरज शर्मा ने की। संचालन सहायक अधिष्ठाता-छात्र कल्याण डॉ. कुंजन आचार्य ने किया। 



इस अवसर पर तीन विवि के कुलगुरु रह चुके तथा अभी राज्यपाल के सलाहकार प्रोफेसर कैलाश सोडानी, पूर्व कुलगुरु प्रोफेसर इंद्रवर्द्धन त्रिवेदी, पूर्व कुलगुरु प्रोफेसर उमाशंकर शर्मा तथा कॉमर्स कॉलेज के पूर्व डीन और राजस्थान स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के उपाध्यक्ष रह चुके प्रोफेसर दरियाव सिंह चुंड़ावत का विशेष अभिनंदन किया गया। 
रजिस्ट्रार डॉ. बीसी गर्ग, विधि महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रोफेसर आनंद पालीवाल, विज्ञान महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रोफेसर एमके जैन, वाणिज्य महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रोफेसर शूरवीर सिंह भाणावत, फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट के निदेशक प्रोफेसर हनुमान प्रसाद, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रोफेसर मीरा माथुर तथा परीक्षा नियंत्रक डॉ. मुकेश बारबर ने बारी-बारी से सभी गुरुजनों को मेवाड़ी पगड़ी, अंग वस्त्र, श्री फल तथा अभिनंदन पत्र प्रदान किया। विद्यार्थियों ने उपस्थित समस्त गुरुजनों का तिलकार्चन कर अंग वस्त्र भेंट कर सम्मान किया।
इस अवसर पर कुलगुरु प्रोफेसर कैलाश डागा ने अपने उद्बोधन में कहा कि महर्षि वेदव्यास ने न केवल वेदों का संकलन किया बल्कि महाभारत जैसे अमर ग्रंथ की रचना कर भारतीय संस्कृति को शाश्वत आधार प्रदान किया। गुरुपूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि ज्ञान का प्रवाह गुरु से शिष्य तक निरंतर चलता रहे। आज के युग में जब सूचना का विस्तार हो रहा है तब हमें भारत-भारती की गहन परंपरा को आत्मसात करना चाहिए। विश्वविद्यालय का यह आयोजन युवाओं में गुरुभक्ति और सांस्कृतिक गौरव जगाने का सशक्त माध्यम बनेगा।
अध्यक्षीय संबोधन में प्रो नीरज शर्मा ने कहा कि गुरुजन-वंदन केवल औपचारिकता नहीं बल्कि ज्ञान परंपरा के प्रति हमारी कृतज्ञता का प्रतीक है। महर्षि वेदव्यास ने ज्ञान को व्यवस्थित रूप देकर समाज को दिशा दी। भारत-भारती का अर्थ है वह समग्र ज्ञानधारा जो वेद, उपनिषद, दर्शन और साहित्य से होकर आज भी जीवित है। सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
राज्यपाल के सलाहकार प्रोफेसर कैलाश सोडानी ने कहा कि वेदव्यास जी का जीवन हमें सिखाता है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं बल्कि समाज का कल्याण है। गुरुपूर्णिमा पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी शिक्षा को नैतिक मूल्यों से जोड़ें।
पूर्व कुलगुरु प्रोफेसर इंद्रवर्द्धन त्रिवेदी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महर्षि वेदव्यास ने इतिहास, धर्म और नीति को एक साथ पिरोया। आज की युवा पीढ़ी को इस बहुआयामी दृष्टि से सीखने की आवश्यकता है ताकि वे आधुनिक चुनौतियों का सामना भारतीय दृष्टिकोण से कर सकें।
पूर्व कुलगुरु प्रोफेसर उमाशंकर शर्मा ने कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा भारत की सबसे बड़ी धरोहर है। गुरुपूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि ज्ञान का सम्मान ही संस्कृति का सम्मान है। वेदव्यास जी के ग्रंथ आज भी हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं।
राजस्थान स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष प्रोफेसर दरियाव सिंह चुंड़ावत ने कहा कि भारत-भारती का अर्थ केवल भाषा नहीं बल्कि ज्ञान, संस्कृति और जीवन दर्शन का समग्र रूप है। विश्वविद्यालय को इस परंपरा को संरक्षित एवं प्रसारित करने का महत्वपूर्ण दायित्व निभाना चाहिए।
रजिस्ट्रार डॉ. बीसी गर्ग ने कहा कि ऐसे आयोजन विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करते हैं। गुरुजनों का सम्मान करके हम आने वाली पीढ़ी के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
रजिस्ट्रार ने सभी अतिथियों, गुरुजनों, विद्यार्थियों एवं आयोजन में सहयोग करने वाले सभी सदस्यों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे पावन अवसर विश्वविद्यालय को ज्ञान की गंगा में स्नान कराने का कार्य करते हैं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापक, कर्मचारी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।


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