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क्यों इतना इतराए रे ओ माटी के पुतले...

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28 Jul 26
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क्यों इतना इतराए रे ओ माटी के पुतले...

राधे-राधे... जोर से बोलो राधे राधे, बालव्यास श्री अनिलकृष्णजी महाराज के श्री मुख से तपोभूमि लालीवाव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का मंगलवार को विश्राम हो गया ।  कथा के आखिरी दिवस पर पण्डित अनिलकृष्ण महाराज ने अपनी मधुर आवाज में कई भजन सुनाएं जिन्हें सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए थे । विदाई की वेला में भागवत कथा वाचक के संग श्रद्धालु श्रोता भी भावुक हो गए थे । अनिलकृष्णजी महाराज ने कथा का समापन इस भजन से किया .... क्यों इतना इतराए रे ओ माटी के पुतले..... । उन्होने कहा कि भौतिकवादी समय में सभी लोग धर्म को झुठला देना चाहते हैं । माया की आंधी में सभी बहे जा रहे हैं ।

तपोभूमि लालीवाव मठ में यज्ञ पूर्णाहुति से सम्पन्न भागवत कथा सप्ताह
शहर के ऐतिहासिक तपोभूमि लालीवाव मठ में सात दिनों से चली आ रही श्रीमद्भागवत कथा मंगलवार को सायं यज्ञ पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न हो गई।
तपोभूमि लालीवाव मठ परिसर में वैदिक ऋचाओं और पौराणिक मंत्रों के साथ लालीवाव पीठाधीश्वर महंत हरिओमशरणदास महाराज के सान्निध्य तथा कर्मकाण्डी पण्डित आचार्य एवं टीम के आचार्यत्व में भागवत यज्ञ हुआ। इसमें श्रीफल से पूर्णाहुति अर्पित की। इस पूर्व व्यासपीठ का माल्यार्पण लालीवाव मठ भक्तों द्वारा व्यासपीठ का पूजन किया।
भगवान श्री कृष्ण सभी जानते है फिर भी उनका कहना कि जो होना होता है वही हो के रहता है ‘होनी को कोई टाल नहीं सकता है’’ प्रत्येक मनुष्य का जन्म एवं मरण निश्चित है एवं समय भी निश्चित है ।
भगवान ने जामवंतजी से कहा कि मरेे पर ‘‘मणी’’ चुराने का कलंक लगा हुआ है - जामवंतजी ने कहा मणी के साथ एक ग्वाह के अप में ‘‘अपनी पुत्री’’ सत्यभामा को स्वीकारन किया एवं जामवंत जी के पुत्री जामवंती से भी विवाह हो गया । भगवान की लिलाए देखने के लिए अनुसरण के लिए नहीं है । शिशुपाल की 99 गालीयां तो माफ कर दी परंतु 100वीं गाली  पर सुदर्शन चक्र से गला काट दिया ।
कलयुग में केवल कथा ही मुक्ति का मार्ग है । राजा परिक्षित की मृत्यु का वृतांत सुनाया । भगवान श्रीकृष्ण को सारे विश्व में भगवान के साथ साथ विश्व का जगत-गुरु के नाम से जाना जाता है ।
मृत्यु एक अटल सत्य:- पण्डित अनिलकृष्णजी ने कथा के मध्य में तोता के दृष्टान्त द्वारा बताया कि मृत्यु एक अटल सत्य है। जिसे कभी टाला नहीं जा सकता। महाराज जी ने कहा कि तोता जो कि श्री कृष्ण के महल में रहता था उससे उसकी पत्नी बहुत प्रेम करती थी। एक दिन रूकमणी तोते को दाना चुगा रही थी तो श्री कृष्ण भगवान ने कहा कि आज ओर इस तोते को दाना चुगा लो कल यह मर जायेगा। रूकमणी बहुत दुःखी हुई और उसने उसकी मृत्यू का कारण भगवान श्री कृष्ण से पूछा। श्री कृष्ण ने बताया की साॅप के ढ़सने से इसकी मृत्यू होगी। रूकमणी ने तोते को बचाने के लिये गरूड़ को तोते का रक्षक बनाया। लेकिन गरूड़ उसकी रक्षा नहीं कर सका। क्योकि उसकी मृत्यू निश्चित थी। इस प्रकार रूकमणी ने श्री कृष्ण भगवान से कहां कि आपने सत्य कहां कि मृत्यू एक अटल सत्य है।
दुष्ट व्यक्ति स्वयं दुःखी होकर दूसरे को दुःख देता हैः-  अनिलकृष्णजी ने बताया कि दुष्ट व्यक्ति दूसरे के दुःख से कभी परेशान नहीं होता बल्कि दूसरे के सुख से परेशान होता है। इसी को महाराज जी ने शतराजित यादव नामक श्री कृष्ण बन्धु के प्रसंग के द्वारा व्यक्त किया। उन्होने कहां कि शतराजित ने सूर्य तप करके एक मणी प्राप्त की थी जो सभी सुख देने वाली होती है। एक दिन शतराजित भगवान श्री कृष्ण की सभा में आये ओर किसी मन्त्री ने शतराजित से कहां कि यह मणी उग्रसेन जी को दे दो क्योकि वो इसके उचित हकदार है। लेकिन उसने देने से इन्कार कर दिया ओर अपने घर जाकर रख दिया। उसका भाई जंगल में खेलते हुये मणी को खो देता है । जिससे जामवन्त ने ले लिया। मणी की चोरी का ईल्जाम भगवान श्री कृष्ण पर लगा इसलिए भगवान उसे खोजने के लिये गये तो एक गुफा में एक लड़की उस मणी से खेल रही थी जैसे ही श्री कृष्ण वहां पहूंचे जामन्त ने यु( करना शुरू कर दिया। बाद में  पता लगा कि वो भगवान श्री विष्णु है तो उन्होने क्षमा याचना की। मणी लाने के बाद शतराजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा की शादी श्री कृष्ण से करने का प्रस्ताव रखा जो कि सभी रानियों में सबसे सुन्दर रानी थी।
पुरूषार्थ से ही श्रेष्ठ भाग्य का निर्माण
महाराजश्री ने कहा कि निस्वार्थ भाव से कार्य करते रहना चाहिए । व्यक्ति पुरुषार्थ से हि अपने श्रेष्ठ भाग्य का निर्माण कर पाता है । वर्तमान में किए जाने वाला पुरूषार्थ ही हमारे अगले जीवन के अच्छे भाग्य का निर्माण करते है ।

मित्रता का महत्व:-  पण्डित अनिलकृष्णजी ने बताया कि श्री कृष्ण की मित्रता सुदामा नामक एक दरिद्र ब्राहम्ण से गुरूकुल में हुई। उन्होने साथ-साथ शिक्षा प्राप्त की। एक दिन सुदामा कृष्ण के हिस्से के चावल खा गये। इससे वे ओर ज्यादा दरिद्र हो गये। भगवान श्री कृष्ण द्वारकापुरी में रहते थे। लेकिन अपने मित्र को हमेशा याद करते थे। एक दिन सुदामा की पत्नी ने एक पोटली भात बांधकर जो कि पड़ोसी से मांग कर लाया गया को सुदामा को दिया ओर कहां कि आप द्वारका जाकर अपने मित्र से मिलकर के आओं। वे तुम्हारी कुछ सहायता कर सकते है। सुदामा द्वारका पुरी पहूंचते है। जिनके पेरो में चप्पल नहीं थी, वस्त्र फटे हुये थे श्री कृष्ण के द्वारपालो ने उनको अन्दर जाने से रोका ओर उनमे से एक श्री कृष्ण के पास गया और सुदामा के बारे में बताया जैसे ही श्री कृष्ण भगवान ने सुदामा का नाम सुना वे भी नंगे पाव दौड़ गये और अपने मित्र से गले मिल गये। उन्हे अपने महल में लाकर उनके चरण धोये और उनकी पूरी सेवा की। उसकी पत्नी द्वारा दिये गये भात को भी बड़े प्रेम से ग्रहण किया और उन्हे सुख समृ(ि का वरदान भी दिया।  इस प्रकार पण्डित अनिलकृष्ण महाराज जी ने इस कथा के माध्यम से बताया कि गरीबी-अमीरी, जात-पात, धर्म आदि को ध्यान में नहीं रखकर श्रेष्ठ व्यक्ति से मित्रता करनी चाहिए। कृष्ण सुदामा की आकर्षक झांकी सभी भक्तगणों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
उन्होने बताया कि इस प्रकार सुखदेव जी ने जब भागवत कथा का सम्पूर्ण कथन किया तदुपरान्त परीक्षित ने प्राणो को सहसुचकसार में स्थापित किया तो तक्षक नाग ने राजा के शरीर को डस कर श्रंगी ऋषि के श्राप को सत्य किया।
भक्ति की कोई उम्र नहीं - महामण्डलेश्वर हरिओमदासजी
तपोभूमि लालीवाव मठ में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दौरान आशीवर्चन के रुप में महामण्डलेश्वर हरिओमदासजी महाराज ने कहा भक्ति के लिए कोई आयु निश्चित नहीं होती है । जिस तरह ध्रुव ने बाल्यावस्था में भजन करके प्रभु को पा लिया, हमें भी वेसी लगन करने की जरुरत है । भजन के लिए बुढ़ापे की प्रतीक्षा मत करो, बुढ़ापे में देह सेवा हो सकती है, देव सेवा नहीं ।
महाराज श्री ने कहा कि संसार सागर में भक्ति एक नौका की तरह है नौका के बिना भव सागर से पार नहीं उतरा जा सकता है उसी तरह भक्ति के बिना मनुष्य जीवन पटरी पर नहीं चल सकता है। इस मौके पर महाराजश्री ने कहा कि ईश्वर भक्ति का मार्ग अपना कर मनुष्य को मोक्ष का मार्ग पर चलना चाहिए। ईश्वर भक्ति के बिना मनुष्य शरीर का कल्याण संभव नहीं होगा।
भागवत कथा में उमड़ा श्रद्धा का ज्वार
तपोभूमि लालीवाव मठ में श्रीमद्भागवत कथा की पूर्णाहुति के अवसर पर श्रद्धालुओं का ज्वार उमड़ आया और विभिन्न कथाओं को सुनते हुए श्रद्धालु कई-कई बार कीर्तनों पर झूम उठे।
तपोभूमि लालीवाव मठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव आज
शहर के ऐतिहासिक तपोभूमि लालीवाव मठ में बुधवार को गुरुपूर्णिमा प्रातः 5 बजे से प्रारंभ जिसमें - गुरुगादी पूजन-प्रातः 5 बजे से, महाप्रसादी भण्डारा-12 बजे से, गुरुदीक्षा-प्रातः 12 से 3 बजे, महाआरती रात्रि 8 बजे, जिसमें आप सभी धर्मप्रेमी सादर प्रार्थनीय है।


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