उदयपुर | गंगा दशहरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और जल-विज्ञान का एक गहरा सांस्कृतिक संदेश है। यह दिवस  नदियों की स्वच्छता, पहाड़ों,  वनों ,  झीलों, तालाबों, बावड़ियों के  संरक्षण का संकल्प दिवस है।

यह विचार गंगा दशहरा की पूर्व  संध्या पर आयोजित  नदी संवाद में व्यक्त किए ।

मुख्य वक्ता विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य डॉ अनिल मेहता ने कहा कि  गंगा दशहरा भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें आस्था, प्रकृति और विज्ञान का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।  नदियां  केवल जलधाराए नहीं, बल्कि जंगल, पहाड़, वर्षा, मिट्टी और मानव सभ्यता का समग्र  पारिस्थितिक, सामाजिक, आध्यात्मिक , वैज्ञानिक  तंत्र हैं। यदि पहाड़ व  जंगल कटेंगे , नदियां  संकरी कर दी जाएगी, उनमें प्रदूषण बढ़ेगा  तो मानव जीवन  संकट में पड़ जाएगा।

पारंपरिक रूप से यह माना जाता है कि इसी दिन मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।  गंगा की प्रचंड धारा को संभालना  मुश्किल   था। तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया और बाद में उन्हें धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया। वैज्ञानिक दृष्टि से समझें, तो यह भारत की प्राचीन “हाइड्रोलॉजी” अर्थात जल-विज्ञान की अत्यंत गहरी समझ को प्रकट करती है।    जटाएं पहाड़ों ,   घने जंगलों, वृक्षों की जड़ों, चट्टानों और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतीक हैं।शिव की जटाओं में गंगा का समा जाना” वास्तव में प्रकृति द्वारा नदी के प्रवाह और वेग को संतुलित करने का संकेत है। 

इसी संदर्भ में उदयपुर का महत्व अत्यंत विशेष  है।उदयपुर की आयड़ नदी गंगा बेसिन  की एक प्रमुख हिस्सा है  । इसे गंगा का पांचवां पाया माना जाता है।  मेहता ने कहा कि जिस प्रकार हिमालय के ग्लेशियर क्षीण हो रहे है उससे  गंगा के जल प्रवाह पर   संकट बढ़ेगा। ऐसे में आयड जैसी नदियां ही गंगा को बनाए रखेगी।  आयड  सहित  समस्त नदियों को उनके  मूल स्वरूप में लौटना  मां  गंगा की  सेवा होकर   वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान को  सार्थक बनाएगा।


झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि  गंगा दशहरा का यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि जिस प्रकार गंगा भारतीय सभ्यता की जीवनरेखा है, उसी प्रकार आयड़ नदी और उदयपुर का झील तंत्र भी इस शहर की आत्मा हैं। आयड़  एक नाला  या ड्रेनेज चैनल के   नहीं है  बल्कि उदयपुर की सांस्कृतिक आत्मा और “स्थानीय गंगा”  है।  इस नदी और  झीलों की स्वच्छता, पवित्रता और मूल स्वरूप को बनाए रखने के लिए समाज, प्रशासन और नागरिकों को मिलकर भागीरथ प्रयास करना होगा।

समाजविद नंद किशोर शर्मा ने कहा कि उदयपुर का विकास रियल स्टेट व मौज मस्ती वाले पर्यटन व्यवसाय पर केंद्रित है जिसे जल केंद्रित बनाना होगा। आयड़ और उदयपुर की झीलों के घाट केवल प्लेजर के नहीं, बल्कि प्रेयर, आध्यात्म, आस्था और पर्यावरण चेतना के केंद्र बनने चाहिए। यदि समय रहते नदी, झीलों और जलस्रोतों के प्रति हमारा दृष्टिकोण नहीं बदला, तो इसके गंभीर पर्यावरणीय परिणाम सामने आएंगे।

युवा पर्यावरणविद कुशल रावल ने कहा कि उदयपुर वास्तव में एक “रिवर सिटी” है । उदयपुर  नेशनल रिवर सिटी अलायंस का हिस्सा  है, जिसका उद्देश्य शहरों का नदी एवं जल केंद्रित विकास है। रावल ने कहा कि गंगा दशहरा पर  युवा वर्ग को पौराणिक कथाओं में छिपे संदेश की वैज्ञानिकता को समझ झीलों, तालाबों, नदियों के संरक्षण के लिए सक्रिय होना होगा।

  द्रुपद सिंह तथा विनोद कुमावत ने कहा कि गंगा दशहरा पर आयड नदी के मूल स्वरूप को लौटने के लिए आम जन को आगे आना चाहिए।