उदयपुर | झीलों की नगरी उदयपुर के हिरण मगरी सेक्टर-13 स्थित 'आशीष वाटिका' के पावन प्रांगण में अध्यात्म की अनूठी वैचारिक क्रांति अपने चरम की ओर अग्रसर है। नौ दिवसीय "पंचम वेद श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान रहस्य" महोत्सव केअष्टम दिवसपर पूजनीया रासेश्वरी देवी जी की दिव्य वाणी से प्रस्फुटित हुए दार्शनिक सूत्रों ने पांडाल में उपस्थित हजारों प्रबुद्ध श्रोताओं को आत्म-मंथन करने पर विवश कर दिया। इस अलौकिक सत्र का शुभारंभ शंखध्वनि, वेदमंत्रों के सस्वर पाठ और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
दिव्य मंच से 'बाल लीलाओं के आध्यात्मिक मर्म' की व्याख्या करते हुए रासेश्वरी देवी जी ने स्पष्ट किया कि भगवान की हर लीला के पीछे जीव के कल्याण का एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा है। पूतना प्रसंग का दार्शनिक विश्लेषण करते हुए उन्होंने बताया कि 'पूतना' अविद्या और अज्ञान का प्रतीक है, जो बाहर से सुंदर रूप धारण करके जीव को भटकाती है। जब जीव पूर्ण रूप से शरणागत हो जाता है, तो परमात्मा स्वयं आकर उस अज्ञान का समूल नाश करते हैं। इसी प्रकार, कालिय नाग मनुष्य की अनियंत्रित इंद्रियों और विषैले अहंकार का प्रतीक है, जिसने मन रूपी यमुना के जल को विषाक्त कर दिया है। भगवान इंद्रियों को नष्ट नहीं करते, बल्कि ज्ञान और भक्ति के माध्यम से उन पर नियंत्रण कर उन्हें सही दिशा (ईश्वर की ओर) मोड़ देते हैं।
'माखन चोरी' लीला के छिपे हुए रहस्य को उद्घाटित करते हुए पूजनीया देवी जी ने कहा कि साक्षात परब्रह्म किसी सांसारिक माखन के भूखे नहीं हैं। दूध को मथकर जैसे माखन निकाला जाता है, वैसे ही जब जीव संसार के तापों में तपकर और एकांत साधना से अपने अंतःकरण को माखन की तरह कोमल और निर्मल बना लेता है, तब भगवान स्वयं आकर उस निर्मल चित्त (माखन) को चुरा लेते हैं। मटकी फोड़ना वास्तव में जीव के 'देहाभिमान' (Physical Ego) को तोड़ने का प्रतीक है। गोवर्धन लीला के दार्शनिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह लीला देवराज इंद्र के पद-मद और अहंकार को चूर करने के लिए थी। भगवान ने यह परम संदेश दिया कि भयवश या सकाम भाव से किसी की उपासना करने के बजाय, जीव को उस सर्वव्यापक परमेश्वर की निष्काम भक्ति करनी चाहिए जो इस पूरी सृष्टि का वास्तविक रक्षक है।
सत्र के अंतिम चरण में, जब पूजनीया देवी जी ने अपने मधुर कंठ से ब्रज के गोपों और गोपियों के निश्छल प्रेम को दर्शाता हुआ भावपूर्ण संकीर्तन कराया, तो संपूर्ण आशीष वाटिका परिसर अलौकिक प्रेमाश्रुओं और उल्लास से सराबोर हो गया। हजारों श्रद्धालु अपने स्थानों पर खड़े होकर भावविभोर अवस्था में नृत्य करने लगे। इसके उपरांत भागवत महापुराण की अलौकिक महाआरती उतारकर उपस्थित जनसैलाब में महाप्रसाद का वितरण किया गया।
भागवत महापुराण प्रवचन श्रृंखला प्रतिदिन सायंकाल 7:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक आशीष वाटिका, हिरण मगरी सेक्टर-13, उदयपुर में आयोजित की जा रही है और इसका भव्य समापन कल 25 मई को होगा।
Udaipur
अहंकार का मर्दन और हृदय की निर्मलता ही कृष्ण-कृपा का एकमात्र आधार: रासेश्वरी देवी जी
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