उदयपुर। नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और पिछले वर्ष 6 सितंबर को उदयपुर में हुआ जलभराव एक चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन के इस गंभीर दौर में पानी के प्राकृतिक रास्तों, पहाड़ों और जलग्रहण क्षेत्रों को समझे बिना किया गया विकास बाढ़ के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। यह चिंता रविवार को आयोजित झील संवाद में व्यक्त किए गए।
संवाद में पर्यावरणविद डॉ अनिल मेहता ने कहा कि हिमालय और अरावली की भौगोलिक परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं, लेकिन जल विज्ञान के सिद्धांत एक समान है।
उदयपुर में विगत वर्षों के बारिश के आंकड़ों से भविष्य की बाढ़ नहीं समझी जा सकती। जलवायु परिवर्तन के दौर में कम समय की अत्यधिक तीव्रता वाली बरसात का आंकलन तथा विश्लेषण करना जरूरी है।
इसलिए , शहरी विकास की योजनाएं केवल सामान्य वर्षा को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि तीव्र बरसात तथा फ्लैश फ्लड को ध्यान में रखकर बनाना जरूरी हो गया है।
डॉ मेहता ने कहा कि विगत वर्ष 6 सितंबर की उदयपुर की अतिवृष्टि इस जोखिम की चेतावनी दे चुकी है। उस समय मदार और गोगुंदा क्षेत्र में कुछ ही घंटों में भारी वर्षा हुई, मदार के दोनों तालाब ओवरफ्लो हुए और आयड में तेज बहाव आया। संकरी तथा उथली आयड ने कई कॉलोनियों को डूबा दिया ।
डॉ मेहता ने कहा कि नेपाल, उत्तराखंड की घटनाओं से यह भी सिद्ध हो चुका है कि पहाड़ियों को काटने, समतल करने तथा पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करने से जोखिम बढ़ता है। उदयपुर में बरसाती नाले, छोटी धाराएं और आयड़ नदी बरसाती पानी के प्राकृतिक प्रवाह मार्ग है। लेकिन इनकी सीमाओं में सड़क, कॉलोनी, होटल, रिसॉर्ट या अन्य सौंदर्य कार्यों से जल प्रवाह मार्ग रुके हैं, संकरे हुए है । इससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।
झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि प्रशासन व नागरिकों को समान रूप से समझने की जरूरत है कि पहाड़ों को काटेंगे तो प्रवाह बदलेगा।
कैचमेंट बिगड़ेगा तो सिल्ट बढ़ेगी और झीलों, तालाबों, नदी नालों को संकरा, उथला करेंगे तो बाढ़ का जोखिम बढ़ेगा।
सामाजिक कार्यकर्ता नंद किशोर शर्मा ने कहा कि मदार, बड़ी, फतेहसागर और पिछोला के कैचमेंट में हुए निर्माणों के कारण भारी मात्रा में सिल्ट पहुंच रही है। ऐसे में थोड़ा पानी आने पर भी ये ओवरफ्लो हो सकती है ।
पर्यावरण प्रेमी कुशल रावल ने कहा कि झीलों में आने वाली सिल्ट के साथ रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, और अन्य प्रदूषक भी पेयजल की झीलों में पहुंच रहे हैं। अत: केवल बाढ़ का ही नहीं, बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है ।
वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह और युवा झील प्रेमी विनोद कुमावत ने कहा कि नेपाल की घटना को केवल हिमालय की त्रासदी मानकर छोड़ देना उदयपुर के लिए बड़ी भूल होगी। उदयपुर को सबक लेना होगा और विकास प्रक्रिया को प्रकृति आधारित बनाना ही होगा।