सलिला संस्था, सलूम्बर द्वारा आज दिनांक 19 अगस्त 2026 को अत्यंत दुःख और भारी मन से प्रतिष्ठित साहित्यकार, शिक्षाविद्, चिंतक, प्रकाशक तथा सलिला शिखर सम्मान से सम्मानित विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार डॉ. संजीव कुमार जी के प्रति श्रद्धा-सुमन अर्पित करने हेतु सायं 7.30 से 9.30 गूगल मीट पर ऑनलाइन स्मृति सभा का आयोजन किया गया।
इस श्रद्धांजलि सभा में देशभर से अनेक साहित्यकार जुड़े। सभी ने नम आँखों और भीगे मन से डॉ. संजीव कुमार जी के विलक्षण एवं महनीय व्यक्तित्व तथा श्लाघनीय कृतित्व को नमन करते हुए उनके असमय और आकस्मिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। सभी ने इसे साहित्य-जगत की अपूरणीय क्षति बताया।
मीडिया प्रभारी प्रोफेसर विमल शर्मा ने बताया कि विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी डॉ. संजीव कुमार का हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति समर्पण, उनकी दूरदर्शी सोच, लेखन-कर्म के प्रति अनन्य निष्ठा, अन्य रचनाकारों को प्रोत्साहित करने की उदार वृत्ति तथा वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठ साहित्य को पहचान दिलाने की गहरी चिंता उन्हें साहित्यकारों की अग्रणी पंक्ति में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।
उन्होंने लगभग चार सौ पुस्तकों का लेखन किया तथा अनगिनत पुस्तकों का संपादन और प्रकाशन किया। इंडिया नेट बुक्स के निदेशक के रूप में उन्होंने स्थापित साहित्यकारों के साथ-साथ नवोदित साहित्य-सृजकों की उत्कृष्ट पुस्तकों को भी व्यापक स्तर पर प्रकाशित किया।
लेखकों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष बीपीए फाउंडेशन की स्थापना कर पाँच सितारा होटल में सम्मान समारोह आयोजित करना साहित्य के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा और रचनाकारों के प्रति उनके सम्मान का परिचायक था।
संस्था की अध्यक्ष डॉ. विमला भंडारी ने भावुक मन से गहरी संवेदनापूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए स्मृतियों की मंजूषा से उनकी मधुर स्मृतियाँ साझा की।
उन्होंने कहा कि डॉ. संजीव कुमार जी भौतिक संपदा से संपन्न होने के साथ-साथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी और प्रेरक व्यक्तित्व थे। उनका हौसला अविस्मरणीय और अनुकरणीय था।
स्वास्थ्य संबंधी प्रतिकूलताएँ भी उनकी जीवटता के समक्ष परास्त हो जाती थीं। वे दृढ़निश्चयी, सरल, सहज और प्रेरणादायी व्यक्तित्व के धनी थे।
राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी सक्रियता और कर्मठता प्रणम्य थी।
प्रकाश तातेड़ ने कहा कि सरल, सौम्य, दृढ़निश्चयी और विषय-विशेषज्ञ डॉ. संजीव कुमार के लिए व्यवसाय बाद में और सेवाभाव पहले था। उनका आदर्श व्यक्तित्व हम सभी के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।
दिनेश कुमार माली ने उन्हें साहित्य की ‘संजीवनी’ बताते हुए कहा कि जिन पुस्तकों के प्रकाशन में लेखकों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था, उन्हें डॉ. संजीव कुमार जी कई बार निःशुल्क प्रकाशित कर देते थे। भौतिकतावादी समय में वे ऐसे विरले प्रकाशक थे, जिन्होंने अर्थ से अधिक साहित्य को महत्व दिया।
प्रोफेसर डॉ. शकुंतला कालरा एवं डॉ. शील कौशिक ने उनके निधन को साहित्य के एक स्वर्णिम युग का अवसान बताते हुए उनकी अदम्य जिजीविषा और साहित्य-साधना को नमन किया।
श्याम पटल पांडेय ने कहा कि विभिन्न भाषाओं में बाल-साहित्य को संकलित, संरक्षित और सहेजने का डॉ. संजीव कुमार का महत्त्वपूर्ण कार्य निःसंदेह बाल-साहित्य के शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार-स्तंभ सिद्ध होगा।
हिम्मत सेठ, उमेशचंद्र सिरसवारी, मेधा, उषा रानी राव, सरिता गुप्ता, कुमुद वर्मा, संध्या गोयल, मधु माहेश्वरी, नरेश मलिक, जगदीश भंडारी, प्रज्ञा गौतम तथा विमला नागला सहित अनेक रचनाकारों ने डॉ. संजीव कुमार के साथ बिताए अविस्मरणीय पलों को स्मरण किया और उनसे जुड़े अपने अनमोल संस्मरण साझा करते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्मृति सभा का भावपूर्ण संचालन नीलम राकेश जी ने किया। अंत में सभी साहित्यकारों और साथियों ने अत्यंत भावुक मन से दिवंगत पुण्यात्मा के प्रति गहरी एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। सभी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि वे पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोक-संतप्त परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति एवं धैर्य प्रदान करें।
डॉ. संजीव कुमार का साहित्य-सृजन, उनका सेवाभाव, रचनाकारों के प्रति उनका अपनत्व और हिंदी साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा सदैव साहित्य-जगत को प्रेरित करती रहेगी। उनका जाना एक ऐसी रिक्तता छोड़ गया है, जिसकी भरपाई संभव नहीं।