उदयपुर | विज्ञान समिति में दर्शन विज्ञान प्रकोष्ठ में आध्यात्म एवं स्वास्थ्य विषय पर वार्ता का आयोजन हुआ। संयोजक डॉक्टर पारस मल जैन ने जैन ग्रंथ के तत्वार्थ सूत्र 6.2 के माध्यम से आध्यात्म, क्षमा व परोपकार की भावना का स्वास्थ्य व जीवन के अन्य घटकों पर अच्छे प्रभाव की विवेचना की। पश्चिम जगत की कई पुस्तकों में भी इस विषय पर नए-नए मनोवैज्ञानिक तथ्य सामने आ रहे हैं।

मुख्य वक्ता प्रोफेसर विमल शर्मा ने अपने जैव रसायन विषय पर शोध एवं अध्ययन के अनुभव व आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर इस विषय में पिछले 20 वर्षों में कई व्यक्तियों के जीवन पर अध्यात्म के स्वास्थ्य, समृद्धि, रिश्तो की मधुरता आदि पर तो प्रभाव देखा, समझा और अनुभव किया उसका सार गर्भित एवं प्रभावी विवेचन प्रस्तुत किया।

प्रोफेसर विमल शर्मा ने बताया कि अवचेतन मन द्वारा ब्रह्मांड से जुड़कर उसकी असीमित शक्ति को प्राप्त किया जाना संभव है। शुद्ध अवचेतन से मन ही इन शक्तियों का प्रयोग कर मानव जीवन की हर समस्या का निदान संभव है।

उन्होंने उपस्थित 48 सदस्यों को अवचेतन मन को शुद्ध करने की प्रक्रिया सिखाई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विज्ञान समिति के अध्यक्ष डॉक्टर के एल तोतावत ने भारतीय संस्कृति में आध्यात्म का व्यावहारिक ज्ञान व अनुभव करने हेतु पर्यूषण जैसे पर्व के महत्वता तथा उसके लाभ पर प्रकाश डाला।

कुल प्रमुख के एल कोठारी, डॉ महीप भटनागर, डॉ एस एल गोदावत, आर के चतुर, आर के खोखावत, के पी तलेसरा, डॉ आर के गर्ग सहित उपस्थित विद्वानों ने परिचर्चा में भाग लेकर इसे समृद्ध किया। चर्चा में एक तथ्य विशेष रूप से सामने आया कि दवा के साथ पवित्र आध्यात्मिक भाव हमें भय मुक्त कर उपचार के त्वरित व श्रेष्ठ फल देता है ।

कार्यक्रम का प्रारंभ कुल प्रमुख डॉ के एल कोठारी द्वारा प्रार्थना से किया गया व डॉ महीप भटनागर ने मंचासीन का तिलक उपरना व साहित्य भेंट कर स्वागत किया।