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गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तरह ही डूंगरपुर ज़िले में स्थित देवसोमनाथ मंदिर में भी एक कॉरिडोर बनाया जाए-के के गुप्ता*

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11 Jan 26
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 नीति गोपेन्द्र भट्ट 

गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तरह ही डूंगरपुर ज़िले में स्थित देवसोमनाथ मंदिर में भी एक कॉरिडोर बनाया जाए-के के गुप्ता*

नई दिल्ली/जयपुर/डूंगरपुर।वरिष्ठ भाजपा नेता और डूंगरपुर नगरपरिषद के पूर्व अध्यक्ष के के गुप्ता ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी से आग्रह किया है कि गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तरह ही दक्षिण राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले में स्थित देवसोमनाथ मंदिर में भी एक कॉरिडोर बनाया जाए ताकि इस अर्वाचीन मंदिर का पुरातत्व महत्व बढ़ने के साथ ही यहां पर्यटन गतिविधियाँ भी बढ़ सकें।  वर्तमान में 11वीं–12वीं शताब्दी  पुराना यह बेजोड़ देवसोमनाथ मंदिर भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के अधीन है।उन्होंने कहा कि देवसोमनाथ मंदिर  हुबहू गुजरात के सोमनाथ मंदिर जैसा है और सोम नदी के तट पर स्थित है। 

 

श्री गुप्ता ने बताया कि गुजरात की राजधानी गांधी नगर से सटे दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर जिले में स्थित देवसोमनाथ मंदिर न केवल एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, बल्कि वागड़ क्षेत्र की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत का भी अनमोल प्रतीक है। सोम नदी के तट पर देव गाँव के समीप स्थित यह मंदिर भगवान शिव के सोमनाथ स्वरूप को समर्पित है और सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।मंदिर के इतिहास को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन सामान्यतः इसका निर्माण 11वीं–12वीं शताब्दी में माना जाता है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार यह मंदिर एक ही रात में बन गया था, हालांकि स्थापत्य शैली और शिल्पकला इसे मध्यकालीन भारतीय मंदिर निर्माण परंपरा से जोड़ती है। माना जाता है कि इस मंदिर की संरचना गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर से प्रेरित है, इसी कारण इसे “देवसोमनाथ” नाम से जाना जाता है।देवसोमनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अद्वितीय वास्तुकला है। यह मंदिर तीन मंजिला है और विशाल पत्थरों से निर्मित है। आश्चर्य की बात यह है कि इसके निर्माण में सीमेंट, चूना या गारे का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों को आपसी संतुलन और जोड़ तकनीक से जोड़ा गया है। मंदिर अनेक खंभों पर आधारित है—कहीं 108 तो कहीं 148 स्तंभों का उल्लेख मिलता है—जो इसकी मजबूती और शिल्प कौशल का प्रमाण हैं। इन स्तंभों और दीवारों पर की गई नक्काशी उस काल के कलाकारों की उच्च कोटि की कला को दर्शाती है।

 

गुप्ता ने बताया कि धार्मिक दृष्टि से यह मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण है। गर्भगृह में दो शिवलिंग स्थापित हैं, जिन्हें स्वयंभू माना जाता है। शिवभक्तों के लिए सावन का महीना, महाशिवरात्रि, पूर्णिमा और अन्य पर्व विशेष महत्व रखते हैं। इन अवसरों पर यहाँ विशाल मेले, विशेष पूजन और रुद्राभिषेक आयोजित होते हैं, जिनमें डूंगरपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और राज्यों से भी श्रद्धालु आते हैं।प्राकृतिक सौंदर्य भी इस मंदिर की पहचान को और विशेष बनाता है। सोम नदी का शांत प्रवाह, आसपास की हरियाली और पहाड़ी परिवेश भक्तों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है। यही कारण है कि देवसोमनाथ मंदिर केवल पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि ध्यान और आत्मिक अनुभूति का भी केंद्र है।आज यह मंदिर राजस्थान की धार्मिक पर्यटन श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ऐतिहासिक विरासत, स्थापत्य कौशल और गहन शिव भक्ति का संगम होने के कारण देवसोमनाथ मंदिर वागड़ क्षेत्र की पहचान बन चुका है। यह स्थल न केवल अतीत की गौरवशाली परंपरा की याद दिलाता है, बल्कि वर्तमान में भी आस्था, संस्कृति और श्रद्धा को जीवंत बनाए हुए है।

गुप्ता ने कहा कि देवसोमनाथ मंदिर का कॉरिडोर  बनने से गुजरात ,राजस्थान और मध्य प्रदेश के पर्यटन सर्किट को बढ़ावा मिलेगा ।

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