बाल साहित्य को लेकर हाड़ोती के बाल साहित्यकारों पर केंद्रित पुस्तक जहां उनके बाल साहित्यिक अवदान को सामने लाती हैं वहीं भावी रचनाकारों को बाल साहित्य लिखने के लिए प्रेरित करती है। बच्चों की उम्र के अनुसार बाल साहित्य, तरुण साहित्य, किशोर साहित्य कैसा लिखा जाएं कि वह बच्चों के लिए रोचक और मनोरंजनपूर्ण हो, इस तथ्य को हाड़ोती के बाल रचनाकारों की कृतियों में काव्य और कथा उद्धरणों से नई पीढ़ी के बाल साहित्य रचनाकारों के सामने लाने में लेखिका डॉ .श्रीमती युगल सिंह सफल रही हैं । पुस्तक के उद्धरण स्पष्ट हैं कि बाल साहित्य ऐसा हो वह सहज सरल शब्दों में लिखा जाए, बच्चें उसे पढ़े तो उनका मनोरंजन हो और कोई न कोई जीवनोपयोगी संदेश भी उन्हें मिले। बाल साहित्य लेखन की सार्थकता तब ही है कि कविताएं ऐसी हो जो बच्चों की जुबान पर चढ़े और वे आसानी से याद रख कर गुनगुना सकें ,गा सकें।
नवोदित और स्थापित बाल साहित्यकार इस पुस्तक में वर्णित साहित्यिक उद्धरणों से बहुत कुछ सीख सकते हैं , यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी भी है और महत्व भी है। लेखिका ने 45 बाल साहित्यकारों को इस पुस्तक में शामिल किया है। उनके परिचय के साथ-साथ उनके द्वारा रचित गद्य-पद्य बाल साहित्य की विधाओं पर रोशनी डाली गई है।
यह पुस्तक इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि यदि कोई भी शोधार्थी अथवा जिज्ञासु पाठक हाड़ोती में बाल साहित्य की दशा और दिशा के बारे में जानने का अथवा शोध कार्य करने इच्छुक है तो यह कृति निश्चित ही उनके लिए एनसाइक्लोपीडिया के रूप में उपयोगी रहेगी। एक ही जगह हाड़ोती अंचल के बाल साहित्यकार एवं बाल साहित्य की दशा और दिशा दोनों इस पुस्तक के केंद्र में हैं।
प्रस्तुत पुस्तक को अध्ययन की सुविधा के लिए 16 अध्यायों में लिखा गया है। प्रथम अध्याय में संदर्भ वश भाषा, भौगोलिक और इतिहास के परिपेक्ष में हाड़ोती का सारगर्भित परिचय दिया गया है। दूसरे अध्याय में बाल साहित्य के विकास क्रम को उल्लेखित किया है। आगे के अध्यायों में बाल साहित्यकारों की बाल साहित्य सृजन विधाओं कविता, कहानी, नाटक, ज्ञान विज्ञान, आत्मकथा, पहेलियां, लोरियां और अनुवाद को सौद्धारण रेखांकित किया गया है। एक अध्याय हाड़ोती अंचल में अकादमी पुरस्कार और नवाचारों पर है। बाल साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में आगे आने वाले साहित्यकारों पर भी एक अलग से अध्याय है।
बाल पत्रिकाएं अध्याय में देश में बाल पत्रिकाओं के क्रमिक विकास को उल्लेखित किया गया है। हाड़ोती अंचल के बाल साहित्यकारों के परिचय और उनकी कृतियों के परिचय पर भी दो अध्यायों में जानकारी समाहित की गई है। उन साहित्यकारों को भी स्थान दिया है जिन्होंने अन्य लेखन के साथ बाल साहित्य पर भी एक या दो कृति लिखी हैं। पुस्तक में स्थान पा कर निश्चित ही वे और अधिक बाल साहित्य सृजन के लिए प्रेरित होंगे। अंत में संदर्भ ग्रंथों का उल्लेख कर लेखिका ने अपनी शोधवृत्ति का परिचय दिया है। आमुख पृष्ठ आकर्षक बना है।
पुस्तक की भूमिका लिखते हुए नोएडा के बाल साहित्यकार दिविक रमेश लिखते हैं, " ग्रंथ का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष, हाड़ौती अंचल के बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, ज्ञान-विज्ञान, आत्मकथा, जीवनी, पहेलियाँ, लोक कथाएँ, हालरे (लोरियाँ) आदि के साथ हाड़ौती अंचल के बाल साहित्यकारों का संक्षिप्त जीवन परिचय है। अलग-अलग विधाओं के साहित्य का विवेचन करते समय विधा के प्रमुख साहित्यकारों के निजी योगदान पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है। दृष्टि इतिहासपरक और प्रवृत्तिमूलक अधिक रही है। खोजा गया है कि हाड़ौती अंचल में सर्वाधिक बाल काव्य की कृतियों के रचनाकार सुरेशचंद्र सर्वहारा हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से बच्चों को ज्ञान, अनुशासन, संस्कार आदि से परिचित कराया है।" पुस्तक पर अपनी बात में साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही ने लेखिका को इस कृति के लिखने के लिए प्रेरित करने, बाल साहित्य के क्षेत्र में अपने प्रयासों एवं योगदान की विस्तार से चर्चा कर इस कृति को बाल साहित्य के क्षेत्र में उपयोगी कृति बताया।
लेखिका डॉ. श्रीमती युगल सिंह अपनी बात में लिखती हैं कि यह कार्य और पुस्तक उनके शोध प्रबंध का विस्तारित रूप है। शोध प्रबंध की सीमा होती है, उसमें केवल 15 बाल साहित्यकारों को लिया गया था। इस कृति को लिखने का विचार बनाया तो उपलब्ध अन्य बाल साहित्यकारों को भी अपने कार्य का हिस्सा बना कर इस विषय को पूर्णता प्रदान करने का प्रयास किया है। वह लिखती हैं, " हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य हिन्दी के बाल साहित्य की समृद्धि से प्रेरणा पाकर ही पुष्पित पल्लवित हुआ है। अतः कविता, कहानी, नाटक, पहेलियाँ, उपन्यास, अनुवाद, आत्म कथा के प्रारम्भिक स्वरूप का भी किंचित परिचय दिया गया है। हाड़ौती अंचल के बाल साहित्य की मजबूत पृष्ठभूमि की जड़ में हिन्दी का बाल साहित्य ही समाहित है। जहाँ तक मेरी विहंगम दृष्टि पहुँची है मुझे प्रतीत होता हैं कि नन्हें शिशुओं के लिए लोरियों, हालरों पर कोई बाल पुस्तक नहीं है जिसे पढ़कर, गाकर माताऐं बच्चों को संस्कारित करने, उनको लाड़-दुलार करने के साथ ही शिक्षित एवं मनोरंजन भी कर सके।" उनका यह कथन बाल साहित्य सृजन को एक दिशा प्रदान करता है।
कह सकते हैं कि हाड़ौती के बाल साहित्य के संदर्भ में बाल साहित्यकार, सृजन विधाएं, साहित्यिक उद्धरण, पुरस्कार, समीक्षा , कृतियां और परिचय सभी पहलुओं को छूते हुए बाल साहित्य की दशा और दिशा को बहुत ही परिश्रम, गहन अध्ययन और समीक्षात्मक एवं शोध दृष्टि से लेखिका ने पुस्तक में करीने से संजोया है। इसी प्रकार से अन्य अंचल के बाल साहित्यकारों पर काम किए जाने के लिए लेखिका का यह कार्य प्रेरित करता है।
पुस्तक : हाड़ोती अंचल का बाल साहित्य का उद्भव एवं विकास
लेखिका : डॉ. श्रीमती युगल सिंह
प्रकाशक : जीएस पब्लिशर डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2025
मूल्य : 595 रुपए
पृष्ठ : 149 हार्ड बाउंड
ISBN : 978 - 81 - 19396 - 03 - 0