GMCH STORIES

“संसार का सबसे बड़ा काम अपने जीवन के कुसंस्कारों को नष्ट करना हैः आचार्य प्रदीप मिश्रा”

( Read 576 Times)

11 Jan 26
Share |
Print This Page

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“संसार का सबसे बड़ा काम अपने जीवन के कुसंस्कारों को नष्ट करना हैः आचार्य प्रदीप मिश्रा”

     हम आज दिनांक 11-1-2025, रविवार को आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के साप्ताहिक सत्संग में सम्मिलित हुए। आज समाज की यज्ञशाला में प्रातः आर्यसमाज के पुरोहित श्री विद्यापति शास्त्री जी के पौरोहित्य में सामूहिक यज्ञ हुआ। यज्ञ में आर्यसमाज के अधिकारी व सदस्यों सहित श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चे सम्मिलित हुए। यज्ञ के बाद सभागार में सत्संग आरम्भ हुआ। भजन, सामूहिक प्रार्थना एवं ऋषि जीवन के प्रसंगों का पाठ ऋषि के जीवन चरित से किया गया। आज का व्याख्यान आर्यसमाज के स्थानीय विद्वान श्री प्रदीप मिश्रा जी का निर्धारित था। विद्वान वक्ता ने अपने व्याख्यान में वैदिक कर्म-फल व्यवस्था पर प्रकाश डाला। 

    आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि मनुष्य जो भी कर्म करता है उसको उनका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। कोई भी कर्म बिना भोगे अर्थात् कर्म के अनुसार सुख व दुःख को प्राप्त किये वा भोगे अन्त वा समाप्ति को प्राप्त नहीं होता। आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य जब कर्मों को करते हैं तो उनके संस्कार हमारे मन व आत्मा पर अंकित हो जाते हैं। जब तक यह संस्कार हटाये नहीं जाते मनुष्य उन कर्मों की पुनरावृत्ति करते रहते हैं। विद्वान वक्ता ने कहा कि हमारे अशुभ कर्मों के जो संस्कार हमारी आत्मा पर पड़ गये हैं उन्हें हटाना हमारा कर्तव्य है। आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने बताया कि जब तक बुरे कर्म के संस्कार नष्ट नहीं किये जाते हैं, तब तक मनुष्य पुराने कर्मों के संस्कारों के कारण जीवन में पुनः पुनः बुरे कर्मों को दोहराते रहते हैं भले ही उन्होंने उन कर्मों को भविष्य में न करने का संकल्प ले लिया हो। आचार्य जी ने कहा कि संसार का सबसे बड़ा काम अपने जीवन के कुसंस्कारों को नष्ट करना है। उन्होंने कहा कि यदि हम पुरोने बुरे कर्मों के संस्कारों को नष्ट नहीं करते तो कितनी भी विद्या प्राप्त कर लें हमें उसका लाभ नहीं होता। 

    आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने सभी श्रोताओं को अपने पुराने अशुभ संस्कारों को अपनी आत्मा व मन से प्रयत्न कर हटाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अशुभ कर्मों को हटाना शुभ व सार्थक कर्म है। आचार्य जी ने गोस्वामी तुलसी दास जी के वचनों ‘बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा। साधन धाम मोच्छ कर द्वारा, पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।’ वाली इस चैपाई को वेदानुकूल बताया और कहा कि इन वचनों में कहे गए कथन ग्राह्य एवं सार्थक हैं। श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ‘मनुष्य का तन हमें बड़े भाग्य से मिलता है और यह देवताओं को भी दुर्लभ है। क्योंकि यह ऐसा साधन है जिसके माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।’ श्री प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि जीवात्मा को मनुष्य जन्म जीवात्मा के पूर्वजन्मों के अधिक संख्या में शुभ कर्मों के होने पर परमात्मा द्वारा दिया जाता है। उन्होंने शुभ कर्म करते हुए मोक्ष मार्ग पर चलने की सबको प्रेरणा की। 

    आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि सभी कि बारम्बार जन्म-मरण व पुनर्जन्म होते रहेंगे और भावी जन्मों में सुख-दुःख आदि मिलते रहेंगे। कष्टों वा दुःखों से छुटकारा मोक्ष मार्ग पर चलने वा मोक्ष को प्राप्त करने पर ही मिलेगा। अचार्य जी ने कहा कि हम अपने पूर्वजन्मों में शुभकर्मों को करके कई बार मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं और मोक्ष अवधि समाप्त होने पर हमें पुनः मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है। हमें पुनः मोक्ष प्राप्ति के लिये मिले इस अवसर का लाभ उठाना चाहिये। उनके अनुसार मोक्ष केवल वैदिक मार्ग पर चलकर व योग समाधि को प्राप्त करके ही मिलता है वा मिलेगा, अन्यथा नहीं मिलेगा। आचार्य जी ने सभी श्रोताओं को आज से ही असत्य व अशुभ कर्मों का त्याग करने तथा सत्य के मार्ग पर चलते हुए शुभ कर्मों को करने की प्रेरणा दी। आचार्य जी ने कर्मों की पांच अवस्थाओं पर भी प्रकाश डाला। यह अवस्थायें प्रसुप्त अवस्था, तनु अवस्था, विछिन्न अवस्था, उदार अवस्था तथा दग्ध बीज अवस्थायें होती हैं। आचार्य जी ने कहा कि जिन मनुष्यों के जीवन में सत्य के पालन का व्रत नहीं होता, ऐसे मनुष्यों को वेद ‘मनुष्य’ होना भी स्वीकार नहीं करता है। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि हम अपने सभी कुसंस्कारों को पूरी तरह से नष्ट करके ही मनुष्य जीवन के लक्ष्य मुक्ति तक पहुंच सकते हैं। 

    आज के व्याख्यान को आर्यसमाज के प्रधान श्री सुधीर गुलाटी ने अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी बताया और विद्वान वक्ता श्री प्रदीप मिश्रा जी का धन्यवाद किया। कार्यक्रम की समाप्ति से पूर्व आर्यसमाज के पुरोहित आचार्य विद्यापति शास्त्री जी ने सामूहिक शान्ति पाठ कराया। इसके बाद प्रसाद वितरण हुआ। आज के आयोजन में माता जगदेवी जी, माता खट्टर जी, श्री कुलभूषण कठपालिया जी, श्री देवकीनन्दन शर्मा जी, श्री ज्ञानचन्द गुप्ता जी, श्री सतीश आर्य जी, श्री आलोक कुमार जी, श्री देवेन्द्र सैनी जी, श्री पवन कुमार जी, श्री बसन्त कुमार जी, श्री सुरेश नैयर आदि अनेक स्त्री व पुरुष तथा स्वामी श्रद्धानन्द बालवनिता आश्रम के बच्चे उपस्थित थे। ओ३म् शम्। 
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121
 


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories :
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like