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तीन शताब्दी से चली आ रही परम्परा का हुआ निर्वाह

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07 Feb 26
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तीन शताब्दी से चली आ रही परम्परा का हुआ निर्वाह

अहमदाबाद (डॉ. दीपक आचार्य) | त्रिकालदर्शी लीलावतार एवं लाखों-करोड़ों भक्तों की आस्था के श्रृद्धा केन्द्र मावजी महाराज की स्मृति में लगभग तीन शताब्दी से जारी परम्परा के अनुसार शनिवार को अहमदाबाद के सरखेज क्षेत्र में सोमनाथ मन्दिर के समीप अवस्थित मावजी मन्दिर पर माव स्मृति महोत्सव अनेक अनुष्ठानों के साथ श्रृद्धापूर्वक मनाया गया।

उल्लेखनीय है कि हर साल नौ-दस दिनों तक बेणेश्वर महामेला पूर्ण हो जाने के बाद अगले ही दिन षष्ठी तिथि पर अहमदाबाद में यह परम्परागत आयोजन होता है। इसमें मावजी महाराज की समाधि को फूलों से सजाया जाता है तथा फलों का ही भोग एवं प्रसाद होता है।

भक्तों व माव अनुयायियों ने मावजी की निर्वाण स्थली पहुंचकर समाधि के समक्ष शीश नवाया, निष्कलंक भगवान के श्रीविग्रह तथा अखण्ड ज्योत के दर्शन कर जीवन में बहुविध खुशहाली, आरोग्य एवं आनन्द प्राप्ति की कामना की। मावजी के उपदेशों और वाणियों तथा आगम वाणी का गान, भजन-कीर्तन आदि में गुरु भक्ति का ज्वार उमड़ आया।

माव स्मृति महोत्सव में मावजी मन्दिर के मुख्य प्रबन्धक पं. पावन पण्डित के आचार्यत्व में पण्डितों के समूह द्वारा विनायक स्तवन से विभिन्न अनुष्ठानों का श्रीगणेश हुआ। वैदिक ऋचाओं और पौराणिक मंत्रों के साथ समाधि स्थल का प्रक्षालन व अभिषेक किया गया, इत्र, चन्दन, कुंकुम, अक्षतादि उपचारों एवं सुगंधित द्रव्यों से पूजन-अर्चन, धूप हवन तथा विभिन्न प्रजातियों के सुगंधित पुष्पों से साज-सज्जा कर मनोहारी सजावट की गई। मंत्रोच्चार के साथ विधि-विधान से पूजा हुई, श्रीफल अर्पित किए गए तथा पांच आरतियां हुई। मन्दिर परिसरों में रंगोली सजायी गई तथा आसापालव के पत्तों से तोरण बांधे गए। साधकों ने अक्षत-कुंकुम एवं पुष्पादि से श्री निष्कलंक श्रीविग्रह का अर्चन किया और माव परम्परा के सभी पूर्ववर्ती पीठाधीश्वरों का स्मरण कर उनकी पूजा की गई।

निष्कलंक श्रीविग्रह का अभिषेक, पूजन-अर्चन

मन्दिर में प्रतिष्ठित निष्कलंक भगवान के श्रीविग्रह का षोड़शोपचार से पूजन-अर्चन एवं अभिषेक के उपरान्त मनोहारी श्रृंगार किया गया। फलों का भोग लगाने के उपरान्त मावजी महाराज की समाधि के समक्ष विशेष पारम्परिक आरती की गई। अन्त में सभी उपस्थित भक्तों एवं अनुयायियों ने फलाहार का प्रसाद पाया।

आज के उत्सव की सबसे बड़ी खासियत यह कि लगभग तीन सदी से चले आ रहे इस उत्सव में अन्न का उपयोग नहीं होता। इस दिन फलाहार का ही भोग लगाया जाता है तथा सभी भक्त फलाहार का ही प्रसाद पाते हैं।

यह है इतिहास

माव मन्दिर परिसर में ‘माव चबूतरा’ अगाध जनास्था का धाम है। मान्यता है कि मावजी ने यहाँ शरीर त्यागा था तथा इसके बाद उनकी दिव्य देह अचानक यहाँ से गायब हो गई व इसकी जगह फूल बिखरे मिले। तभी से इस स्थल को मावजी महाराज का चमत्कारिक निर्वाण समाधि स्थल मानकर पूजा जाता रहा है और उनकी स्मृति में हर साल मेले के बाद ही छठ को फूलों का उत्सव तथा फलों का भोग प्रसाद होता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस स्थल पर आने वालों की मनोकामनाएँ मावजी महाराज की कृपा से पूर्ण होती हैं। माव भक्तों का साल भर इस धाम पर आवागमन चलता रहता है।


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