उदयपुर — सावन की कृष्ण पक्ष की अमावस्या, जिसे स्थानीय रूप से "हरियाली अमावस्या" कहा जाता है, हर साल पूरे शहर में उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। यह त्यौहार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहकर तीन दिवसीय ऐतिहासिक मेले का रूप ले लेता है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण, मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और महिला सशक्तिकरण की गूंज देखने को मिलती है।
इतिहास और महत्व हरियाली अमावस्या की शुरुआत मेवाड़ के तत्कालीन शासक महाराणा फतेह सिंह से जुड़ी है। सन् 1898 में महाराणा ने देवाली तालाब को विस्तृत जलाशय में बदलकर आज के फतेह सागर झील का निर्माण करवाया।
जब पहली बार मानसून की बारिश से यह झील भर गई तो महाराणा ने क्षेत्र के किसानों और जनता के लिए आनंद-समारोह का आयोजन किया, वही आयोजन आज के भव्य मेले का आधार बना।
तब से यह उत्सव उदयपुर की सांस्कृतिक पहचान की एक विश्वसनीय निशानी बन गया है।
महिला-सुरक्षा और समावेशिता उदयपुर का यह मेला महिला सशक्तिकरण का भी 125 साल पुराना उदाहरण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक तौर पर रानी चावड़ी जी की पहल पर मेले के एक पूरे दिन को विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए आरक्षित किया गया था।
तब से यह परंपरा बरक़रार है: उस दिन पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित रहता है, जिससे महिलाएं निडरता से मेले का आनंद ले सकें, खरीदारी करें और लोक कला का आनंद उठाएं।
स्थानीय समाज इस समावेशी परंपरा पर गर्व करता है।
आयोजन और सरकारी बंदोबस्त हरियाली अमावस्या के दौरान फतेह सागर के किनारे और सहेलियों की बाड़ी पार्क में तीन दिवसीय मेला लगाया जाता है। मेले के दिनों में जिला प्रशासन और नगर निगम द्वारा कभी-कभी राजकीय अवकाश भी घोषित किया जाता है, ताकि नागरिक पूरे उत्सव में शामिल हो सकें। इन दिनों पार्कों और झील तट के प्रवेश शुल्क को माफ कर दिया जाता है ताकि पर्यटन स्थल अधिक सुलभ बने।
मेला का रंगरूप मेले में पारंपरिक झूले, राजस्थानी लोक कलाकारों के प्रस्तुतिकरण, स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानों और पारंपरिक वेशभूषा में सजी भीड़ देखने को मिलती है। खास तौर पर बच्चों की बजाई जाने वाली बांसुरी 'पूपाड़ी' की आवाज और रबड़ी-मालपुए का स्वाद इस उत्सव को और भी खास बनाते हैं। लोक नृत्य, गीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ युवाओं और बुज़ुर्गों, ग्रामीण और शहरी सभी को जोड़ती हैं।
सामाजिक-धार्मिक प्रार्थना और पर्यावरण हरियाली अमावस्या प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने, भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना, तथा पितरों के तर्पण के लिए समर्पित है।
इस मौके पर शहर भर में वृक्षारोपण अभियानों का आयोजन भी विशेष रूप से किया जाता है। स्थानीय लोग पीपल, बरगद, नीम आदि के पौधे लगाते हैं और उनकी देखभाल के लिए वचनबद्धता जताते हैं।
सावन की वर्षा से इन पौधों को सजीवता मिलती है और पारिस्थितिकी की रक्षा में मदद मिलती है।
पारंपरिक प्रथाएँ और अनुष्ठान शिव-पूजा: सावन का महीना शिवजी को प्रिय माना जाता है; इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
पितृ तर्पण: अमावस्या तिथि पर पितरों की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व है।
दान-पुण्य: गरीबों, ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को दान देने को श्रेष्ठ कर्म माना जाता है।
परहेज़: दिन के दौरान पेड़ों या शाखाओं को काटने से परहेज़ किया जाता है; इसे अप्रसन्नता और प्रकृति के प्रति अन्याय माना जाता है।
समुदाय और पर्यावरण का मेल उदयपुर के मेले में अरावली की पहाड़ियों से आने वाले आदिवासी समुदाय पारंपरिक वेशभूषा में शिरकत करते हैं, जिससे इस आयोजन की सांस्कृतिक विविधता और गहराई और बढ़ जाती है। पर्व के अवसर पर स्थानीय एनजीओ और पर्यावरण समूह वृक्षरोपण और जागरूकता शिविर भी आयोजित करते हैं, ताकि त्योहार का पारिस्थितिकीय संदेश अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचे।
नगरीय गौरव स्थानीय लोगों के अनुसार हरियाली अमावस्या उदयपुर की “पहचान और गौरव” है। यह न केवल धार्मिक आयोजन है बल्कि एक ऐसा पर्व है जो पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक समरसता, महिलाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है।
नागरिकों के लिए संदेश जिलाधिकारी और मेला आयोजक नागरिकों से अनुरोध करते हैं कि वे त्योहार के दौरान स्वच्छता बनाये रखें, सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा न फैलाएं, और वृक्षारोपण व पर्यावरण संरक्षण अभियानों में सक्रिय भागीदारी दें। साथ ही बच्चों को इस परंपरा और उसके महत्व के बारे में अवश्य पढ़ाया-समझाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस विरासत को संरक्षित रखें।