उदयपुर। गणेश चतुर्थी केवल भगवान गणेश की पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि जीवन में आने वाले विघ्नों पर धैर्य, विवेक और विश्वास से विजय पाने की प्रेरणा देने वाला अवसर है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, विघ्नराज और विघ्नेश्वर के रूप में स्मरण किया जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले ‘श्री गणेशाय नमः’ कहने की परंपरा भी इसी विश्वास से जुड़ी है कि गणपति का स्मरण कार्य की राह में आने वाली बाधाओं को दूर करता है।
नारायण सेवा संस्थान में अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में चल रही ‘अपनों से अपनी बात’ कथा में रविवार को गणेश चतुर्थी की पूर्व संध्या पर देशभर से आए दिव्यांग बंधु-बहनों से संवाद करते हुए उन्होंने भगवान गणेश के विघ्नहर्ता स्वरूप से जुड़ी पौराणिक कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि जीवन में सफलता केवल साधनों से नहीं, बल्कि सही दृष्टि, विवेक और सकारात्मक भाव से मिलती है।
उन्होंने कथा प्रसंग सुनाते हुए बताया कि प्राचीन समय में राजा अभिनंदन ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ में देशभर से ऋषि-मुनि और विद्वान पहुंचे। इसी दौरान राजा के मन में देवराज इंद्र को यज्ञ का भाग न देने का अहंकार उत्पन्न हुआ। इससे चिंतित इंद्र ने यज्ञ में विघ्न डालने के लिए विघ्नासुर को भेजा।
विघ्नासुर ने यज्ञ की व्यवस्थाओं में लगातार बाधाएं उत्पन्न करनी शुरू कर दीं। कभी यज्ञ सामग्री समय पर नहीं पहुंचती तो कभी अनुष्ठान के दौरान कोई नई समस्या सामने आ जाती। परेशान ऋषि-मुनियों ने भगवान गणेश का स्मरण किया। गणपति ने विघ्नासुर का सामना किया और अंततः उसे अपनी शरण में आने के लिए विवश कर दिया। विघ्नासुर ने क्षमा मांगी, जिसके बाद भगवान गणेश ने उसे नियंत्रित कर दिया। इसी प्रसंग से गणेशजी के विघ्नराज और विघ्नेश्वर स्वरूप की महिमा जुड़ी मानी जाती है।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि किसी भी नए कार्य का आरंभ अहंकार, क्रोध या लालच से नहीं, बल्कि विनम्रता, विवेक और सकारात्मक सोच के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि रास्ते में आने वाली बाधाएं जीवन का हिस्सा हैं। उनसे घबराने के बजाय धैर्य और विश्वास के साथ उनका सामना करना चाहिए। भगवान गणेश का स्वरूप हमें यही सिखाता है कि बुद्धि और विवेक के साथ उठाया गया कदम कठिन से कठिन परिस्थिति को भी सरल बना सकता है।