उदयपुर। नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने ‘अपनों से अपनी बात’ के दूसरे दिन कथा के दौरान एकादशी के आध्यात्मिक महत्व से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से व्रत, भक्ति और सेवा का मर्म समझाया।

उन्होंने कहा कि एकादशी केवल अन्न त्यागने का पर्व नहीं, बल्कि मन को भगवान से जोड़ने और अपने हाथों को जरूरतमंदों की सेवा में लगाने का अवसर है।

व्रत तभी सार्थक है, जब उसका भाव स्वयं तक सीमित न रहकर किसी दूसरे के जीवन में राहत और प्रसन्नता लाए।उन्होंने ललित-ललिता के प्रसंग के माध्यम से बताया कि मन की एकाग्रता भक्ति का महत्वपूर्ण आधार है।

ललित का मन पूजा और गायन के बीच भटक गया, लेकिन उसकी पत्नी ललिता ने प्रेम और समर्पण की मिसाल कायम की। ऋषि के मार्गदर्शन में उसने इंदिरा एकादशी का व्रत कर उसका पुण्य अपने पति को अर्पित किया, जिससे उसका उद्धार हुआ।

अग्रवाल ने कहा कि पुण्य को भी दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित किया जा सकता है।

जो व्रत केवल अपने लिए हो, वह उपवास है, लेकिन जो किसी और के लिए हो, वह प्रार्थना बन जाता है।राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि के प्रसंग से उन्होंने विनम्रता, अतिथि-सत्कार और भक्ति भाव का संदेश दिया।

अंबरीष ने अपने जीवन की प्रत्येक इंद्रिय को भगवान की ओर मोड़ा और संकट के समय भी संयम नहीं खोया। उन्होंने कहा कि भक्ति का अर्थ इंद्रियों का त्याग नहीं, बल्कि उनकी दिशा बदलना है।

हाथ वही रहें, लेकिन उनका उपयोग किसी को कष्ट देने के बजाय सेवा में हो।राजा खट्वांग के प्रसंग से उन्होंने समय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन कितना लंबा है, यह महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि उपलब्ध समय का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है, यह महत्वपूर्ण है।

खट्वांग को जब केवल एक मुहूर्त का जीवन शेष होने का पता चला तो उन्होंने उस समय को भगवान को समर्पित कर दिया।

उन्होंने कहा कि सेवा के लिए दिया गया समय भी पूजा है।प्रशांत अग्रवाल ने एकादशी के अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे व्रत-उपवास के साथ सेवा का संकल्प भी लें।

उन्होंने कहा, “भगवान को हमारा उपवास नहीं चाहिए, भगवान को हमारे हाथ चाहिए।” इसलिए किसी दिव्यांग, असहाय, वृद्ध या जरूरतमंद के काम आना ही भक्ति को व्यवहार में उतारना है।

इस दौरान उन्होंने लाभान्वित दिव्यांग बंधुओं से संवाद भी किया।