उदयपुर। रात का सन्नाटा हो या दिन की तपती धूप… फोन की घंटी बजती है और दूसरी तरफ से किसी गांव से आवाज आती है—“एक पशु घायल है, उसकी हालत बहुत खराब है।” इसके बाद यह नहीं पूछा जाता कि गांव कितनी दूर है, रास्ता कैसा है या वहां पहुंचने में कितना समय लगेगा।

एक ही सवाल होता है—“बेजुबान को कितनी जल्दी बचाया जा सकता है?”यही सोच पिछले करीब 15 वर्षों से डॉ. माला मट्ठा और किरण भावसार को पशु सेवा के रास्ते पर लगातार आगे बढ़ा रही है।इन दोनों ने बेजुबानों को कभी सिर्फ पशु नहीं माना।

उन्होंने उन्हें अपने बच्चों की तरह अपनाया। किसी घायल गौमाता की आंखों में दर्द हो, नंदी महाराज सड़क हादसे में घायल हो या कोई पक्षी जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहा हो—हर बेजुबान इनके लिए परिवार के सदस्य जैसा है।इसी संवेदना और ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के लिए उपचार एवं रेस्क्यू सुविधाओं की कमी को देखते हुए 11 सितंबर 2021 को एनिमल प्रोटेक्शन सोसाइटी उदयपुर की स्थापना की गई।पांच साल में 12 हजार से अधिक रेस्क्यूपांच वर्षों की इस यात्रा में संस्था अब तक 12 हजार से अधिक पशु-पक्षियों का रेस्क्यू कर चुकी है।

उदयपुर से करीब 250 किलोमीटर तक दूर गांवों से आने वाली मदद की सूचना पर टीम पहुंचती है।कभी खेतों में फंसा पशु, कभी हाईवे पर दुर्घटना का शिकार बेजुबान, कभी कुएं में गिरा नंदी और कभी गंभीर बीमारी से जूझती गौमाता—हर सूचना संस्था के लिए एक जिम्मेदारी बन जाती है।रेस्क्यू के बाद घायल या बीमार पशु को उपचार के लिए उदयपुर लाया जाता है।

उपचार और देखभाल के बाद स्वस्थ होने पर उसे उसके मूल स्थान और परिचित वातावरण में वापस पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।सेवा की कोई सीमा नहींसंस्था की टीम गौमाता, नंदी महाराज, ऊंट, श्वान, गधे, घोड़े, कबूतर और अन्य पक्षियों के लिए लगातार काम कर रही है।

अब तक 15 से अधिक ऊंटों का रेस्क्यू किया जा चुका है।पक्षी संरक्षण के लिए 7 हजार से अधिक गोरैया घर लगाए गए हैं।

गर्मी के मौसम में पशु-पक्षियों को पानी उपलब्ध कराने के लिए हर वर्ष 500 से अधिक पानी के कुंड लगाए जाते हैं।हाईवे पर रात के समय पशुओं को वाहन चालकों द्वारा दूर से देखा जा सके, इसके लिए रेडियम कॉलर लगाने की मुहिम भी चलाई जा रही है।

इसके साथ पशु कल्याण और सड़क सुरक्षा को लेकर जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।रेस्क्यू के साथ क्रूरता के खिलाफ आवाजडॉ. माला मट्ठा का मानना है कि घायल पशु को बचाना जितना जरूरी है, उसके साथ हुई क्रूरता के लिए जिम्मेदारी तय करना भी उतना ही जरूरी है।इसी सोच के साथ संस्था “रेस्क्यू + कानूनी कार्रवाई + जवाबदेही” के सिद्धांत पर काम करती है।

पशु क्रूरता के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करवाने, पुलिस एवं प्रशासन के साथ समन्वय और कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाने में संस्था सक्रिय भूमिका निभाती रही है।सम्मान बहुत मिले, लेकिन सबसे बड़ा पुरस्कार एक जिंदगी हैपशु सेवा के क्षेत्र में डॉ. माला मट्ठा को जिला पशु कल्याण पुरस्कार, उदयपुर रतन पुरस्कार, राजस्थान पत्रिका का स्पेशल 26 सम्मान, मदर ऑफ एनिमल्स सम्मान, कोरोना वॉरियर सम्मान, सेवा सम्मान, आई एम शी अवॉर्ड, वंडर वुमन अवॉर्ड और 100 इन्फ्लुएंशियल फेम्स 2024 सहित कई सम्मान प्राप्त हुए हैं।अगस्त 2023 में ब्रिटेन की डेली इंस्पायर्ड लाइफ मैगजीन ने उनके पशु सेवा कार्य को अपने मुखपृष्ठ पर स्थान दिया।लेकिन इन दोनों के लिए सबसे बड़ा सम्मान कोई ट्रॉफी या प्रमाण-पत्र नहीं है।सबसे बड़ा सम्मान वह पल है, जब इलाज के बाद कोई घायल बेजुबान फिर से अपने पैरों पर खड़ा होता है।डॉ. माला मट्ठा कहती हैं—“मेरे लिए पशु केवल पशु नहीं हैं, ये मेरे बच्चे हैं।

जिस बेजुबान की आवाज इंसानों तक नहीं पहुंचती, उसकी आवाज बनना हमारी जिम्मेदारी है।”इस सेवा यात्रा में किरण भावसार के साथ अजाज, मुस्तफा, भावना जैन, अविचल गांधी, मोहित जैन और पूरी टीम का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

संस्था का कहना है कि यह सफर किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी टीम, सहयोगियों और उन हजारों संवेदनशील लोगों का है जिन्होंने समय पर सूचना देकर एक जिंदगी बचाने में मदद की।पांच साल पूरे, लेकिन सफर अभी जारी है11 सितंबर 2021 को शुरू हुआ यह छोटा-सा संकल्प आज 12 हजार से अधिक जिंदगियों तक पहुंच चुका है।इन पांच वर्षों में आंकड़े बढ़े, रेस्क्यू बढ़े और सेवा का दायरा बढ़ा—लेकिन मूल भावना आज भी वही है।किसी बेजुबान को दर्द में अकेला नहीं छोड़ना।क्योंकि इनके लिए हर रेस्क्यू सिर्फ एक मामला नहीं है।वह किसी मां का बच्चा है, किसी झुंड का साथी है, किसी परिवार का हिस्सा है और सबसे बढ़कर—एक जिंदगी है।और शायद यही वजह है कि उदयपुर से शुरू हुई यह सेवा आज सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे उन लोगों का भरोसा बन चुकी है, जिन्हें यकीन है कि उनकी आवाज कहीं न कहीं जरूर सुनी जाएगी।“जिसकी आवाज नहीं है, उसकी आवाज बनना ही सच्ची इंसानियत है।”