संगीत का प्रकृति से गहरा सम्बन्ध है | भारत के विद्वान शास्त्रीय संगीतज्ञों ने जहाँ ऋतुओं पर आधारित रागों की रचना की वहीं शास्त्रीय नृत्य गुरुओं ने इन्ही रागों पर मनमोहक नृत्य और भाव भंगिमा की संरचना से प्रभावी अभिव्यक्ति दी है | भारत के विभिन्न भागों में शास्त्रीय संगीत और नृत्य के गुरुजन युवा पीढ़ी को गुरुशिष्य परम्परा के तहत व्यावहारिक प्रशिक्षण देते रहे हैं | इन प्रदर्शन कलाओं को रसिक दर्शकों तक पहुँचाने में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रों ,संस्थानों और अकादमियों का अनवरत योगदान रहा है | मेवाड़ में शास्त्रीय संगीत में रूचि रखने वालों के लिए पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर श्रावण मास में वार्षिक ‘मल्हार’ उत्सव आयोजित करता है | इस उत्सव में उदयपुर वासियों को जहां देश के युवा संगीतज्ञों और नर्तकों की प्रतिभा देखने सुनने का मौक़ा मिलता है वहीं वर्षों से साधनारत कलाकारों को अपना हुनर दिखाने का अवसर मिलता है | इस वर्ष मल्हार उत्सव का सफल आयोजन शिल्पग्राम में 8अगस्त ( शनिवार ) और 9अगस्त ( रविवार ) को हुआ | केंद्र निदेशक डॉ अश्विन एम. दलवी ने मल्हार का शानदार अर्थ बताया कि सारी मलीनताओं को, मेल को हरने वाला है मल्हार | वर्षा ऋतु में सारी मलीनताएं पानी में बह कर स्वच्छ हो जाती हैं | वातावरण का पुनर्निर्माण होता है |नई जागृति और चेतना का निर्माण होता है | सच भी है कि वातावरण की इस ख़ूबसूरती का शास्त्रीय संगीत और नृत्य के साथ अनुभव कराने के लिए मल्हार उत्सव बहुत प्रासंगिक है | इस बार दो दिवसीय उत्सव में गुजरात, महाराष्ट्र और गोवा के अलावा केरल के कलाकारों ने उदयपुर के रसिक दर्शकों को आल्हादित किया | विगत कुछ दिनों से मानसून मेवाड़ पर कृपा करने में कंजूसी बरत रहा था | बादल आते ज़रूर, पर बरसते नहीं | इस उत्सव के दूसरी शाम को सितार वादन हुआ और सितार के तारों की झंकार ने बादलों को झकझोरने की कोशिश की | नतीजा सकारात्मक रहा ...देर रात तक चले कार्यक्रम के बाद कुछ फुहार के आसार नज़र आने लगे और दो दिन बाद ही सही मेघों ने मेवाड़ पर कृपा वृष्टि की | | गोवा से आये सितार वादक विनायक चित्तर ने राग गौड़ मल्हार से कार्यक्रम का आगाज किया | पूरी तन्मयता के साथ आलाप ,जोड़ और झाला की प्रस्तुति में विनायक चित्तर ने प्रेक्षागृह में बैठे श्रोताओं के मन में सावन की फुहार, बूंदा बांदी,रिमझिम, झड़ी और मूसलाधार बारिस का वातावरण निर्माण किया | तबले पर रायपुर से आये पं. पार्थसारथी मुखर्जी की संगत ने इस सुर-यात्रा को लय का सशक्त आधार दिया।
दोनों कलाकारों के वाद्यों में हुए संवादों का श्रोताओं ने भरपूर आनंद लिया | | समारोह की अंतिम प्रस्तुति केरल के शास्त्रीय नृत्य मोहिनीअट्टम की थी | उदयपुर में काफी लम्बे अरसे बाद मोहिनीअट्टम का इतना लम्बा प्रदर्शन देखने को मिला | नृत्यांगना गुरु पल्लवी कृष्णन ने भक्ति रस से ओतप्रोत अपनी पहली प्रस्तुति ‘शिव पंचाक्षर स्तोत्रम्’ में विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया |उन्होंने इस स्रोत्र के एक एक शब्द को सुन्दर और सटीक नृत्याभिनय में पिरोया | ‘नमः शिवाय’ की इस प्रस्तुति को शिवमय बनाने में सुरीले गायन और प्रकाश योजना का बड़ा हाथ रहा | उनकी अगली सामूहिक प्रस्तुति ‘माया मोहन कृष्ण’ थी | इसमें द्रौपदी चीर हरण के समय श्री कृष्ण द्वारा लाज बचाने ,गजेंद्र की मगर से रक्षा करने और कुरुक्षेत्र में अर्जुन को अपना विशाल स्वरुप बताकर कर्म करने के लिए प्रेरित करने वाले प्रसंग प्रस्तुत हुए | कलाकारों ने मनोहारी नृत्य और उम्दा अभिनय ने दर्शकों को सम्मोहित कर दिया | सामूहिक प्रस्तुति ‘चिंताविष्टायाया सीता’ में समूचे दल ने सीता के विभिन्न प्रसंगों की प्रस्तुति के द्वारा आज के संदर्भ में नारी की पीड़ाओं का सटीक चित्रण किया | सीता का धरती में समा जाने का दृश्य को पूरे दल ने बहुत मार्मिक बनाया | मल्हार उत्सव की शुरवात शनिवार शाम हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठित गायिका गौरी पाठारे के शास्त्रीय गायन से हुई | पहले उन्होंने अपना मन पसंद राग मारवा गाया जिसके बोल थे पिया मोरे आये | मारवा के गंभीर स्वरों के बाद गौरी पठारे ने ग्वालियर घराने की बंदिश गौड़ मल्हार में पेश की | उनकी तीव्र तानों ने दर्शकों को आल्हादित किया | बादमें कजरी “ कारी कारी बदरिया” सुनाई | इसी सांगीतिक यात्रा को संगतकार पुष्कराज जोशी( तबला ) और सुप्रिया मोड़क जोशी(संवादिनी / हारमोनियम) का योगदान रहा | शनिवार की दूसरी प्रस्तुति में अहमदावाद से आई हेतल मेहता जोशी ने विलंबित धमार में एकल वादन शुरू करते हुए ताल की गंभीरता और वीर रस को प्रभावपूर्ण रूप से उभारा।
उन्होंने तबला वादन की विभिन्न प्रकारों जैसे उठान, चलन, चारी, बांट, रेला, उपज का प्रदर्शन किया | बनारस घराने कीतीन ताल में निबद्ध रचनाएं सुनाईं | उनके प्रस्तुति अनागत को काफी सराहना मिली | आभार प्रकट करने की भावना से उन्होंने अपने गुरुओं की रचनाएं सुनाईं अपनी सृजनशीलता का परिचय दिया।
पंडित राजेंद्र बनर्जी की हारमोनियम लेहरा संगत ने लय के इस विस्तार को सुरों का मजबूत आधार प्रदान किया।
हेतल मेहता जोशी के कार्यक्रम की खासियत यह रही कि उन्होंने दर्शकों को भी अपनी प्रस्तुति के साथ जोड़ लिया | यह बात सच में सुखद है | शास्त्रीय संगीत के कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के साथ दर्शकों को हमारी प्राचीन संगीत परम्पराओं से जोड़ने का पुनीत कार्य भी करना चाहिए | सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक डॉ. अश्विन एम. दलवी ने जैसे बताया कि "मल्हार" का उद्देश्य भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य की समृद्ध परंपरा को व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचाना, युवा पीढ़ी में उसके प्रति रुचि जागृत करना तथा देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन को नई गति प्रदान करना है | यह उद्देश्य उनकी और कलाकारों की मेहनत से सुफल रहा | डाक्टर दलवी के आने के बाद प्रदर्शन और चाक्षुष कलाओं में नवाचार दिख रहे हैं | इसके लिए उन्हें और उनकी टीम को बधाई | Photos by Rajdeep Sharma