उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में मंगलवार को पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति में भव्य धर्मसभा आयोजित हुई।

साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने प्रवचन में मैत्री भाव, सकारात्मक सोच, आत्मशुद्धि और पुरुषार्थ का महत्व समझाया।साध्वीश्री ने कहा कि संसार में जितने भी जीव हैं, जितनी चेतनाएं हैं, वे सभी हमारे मित्र हैं।

पर्युषण का एक दिन भी यदि कषायों के गहरे बंधन को थोड़ा ढीला करने में बीत जाए तो समझना चाहिए कि वह दिन सफल रहा। उन्होंने कहा कि सच्ची मित्रता में एक-दूसरे को अच्छी वस्तुएं देना-लेना, साथ खाना-खिलाना तथा मन की बात कहना-सुनना शामिल है।

मन की बातें भीतर दबाकर रखने से व्यक्ति कुंठित हो जाता है। नकारात्मक विचार अनेक परेशानियों का कारण बनते हैं, जबकि प्रसन्न मन व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी सहज बनाए रखता है।

उन्होंने कहा कि अपने मूल्यवान आंसू हर किसी के सामने नहीं बहाने चाहिए, बल्कि अपना दुख सच्चे मित्रों के साथ साझा करना चाहिए।साध्वीश्री ने आर्द्र कुमार की प्रेरणादायी कथा सुनाते हुए बताया कि श्रेणिक राजा की ओर से भेजे गए उपहार में आर्द्र कुमार को एक प्रतिमा मिली।

प्रतिमा को एकाग्रता से देखते ही उन्हें पूर्वजन्म की स्मृतियां जागृत हुईं और पुरानी मित्रता का बोध हुआ।

वे अपने मित्र से मिलने के लिए निकलना चाहते थे, लेकिन राजा ने उन्हें अकेले जाने से रोकते हुए 500 सैनिक सुरक्षा में लगा दिए।आर्द्र कुमार ने अपनी सूझबूझ से सैनिकों का विश्वास जीता और प्रतिदिन घूमने की दूरी धीरे-धीरे बढ़ाते गए।

अंततः उन्होंने जहाज की व्यवस्था की और अपने लक्ष्य की ओर रवाना हो गए। साध्वीश्री ने कहा कि जिसे अपने लक्ष्य की ओर जाना होता है, वह परिस्थितियों के बीच भी रास्ता बना लेता है।

पुण्य के साथ पुरुषार्थ भी आवश्यक है। सही दिशा में किया गया पुरुषार्थ हो तो पुण्य भी पीछे-पीछे चलता है और परिस्थितियां अनुकूल बनने लगती हैं।इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।

धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने श्रद्धापूर्वक प्रवचन का लाभ लिया।