सत्य भूषण शर्मा
प्रवक्ता, पत्रकार, लेखक, कवि एवं यूट्यूबर, उदयपुर (राजस्थान)
देश की अर्थव्यवस्था में कुछ आंकड़े ऐसे होते हैं, जिन्हें समझने के लिए अर्थशास्त्र पढ़ना जरूरी नहीं होता। जब पेट्रोल पंप पर जेब ढीली हो, जब रसोई में चीनी का भाव सुनकर गृहिणी का बजट बिगड़ जाए और जब सरकार को घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए विदेश से चीनी मंगाने का फैसला करना पड़े, तब आम आदमी अपने अनुभव से ही अर्थशास्त्र समझने लगता है।
आज देश में पेट्रोल, एथेनॉल और चीनी का मामला कुछ ऐसा ही बन गया है। सवाल उठता है—गन्ना खेत से निकला तो आखिर जाएगा कहाँ? चीनी की बोरी में, एथेनॉल के टैंक में या पेट्रोल की टंकी में?
और इसी उलझे हुए सवाल के बीच आम आदमी कह रहा है—“पेट्रोल, एथेनॉल और चीनी… सब गड़बड़झाला है भाई!”
चीनी की मिठास में आई कड़वाहट
अगस्त 2026 में चीनी की बढ़ती कीमतों ने सरकार और उपभोक्ताओं दोनों की चिंता बढ़ा दी है। केंद्र सरकार के 21 अगस्त के आधिकारिक बयान के अनुसार, औसत खुदरा चीनी कीमत 20 जुलाई को ₹48.18 प्रति किलो से बढ़कर 20 अगस्त को ₹55.70 प्रति किलो हो गई। यानी एक महीने में लगभग 15.6 प्रतिशत की वृद्धि। दूसरी ओर, थोक/एक्स-मिल बाजार में कीमतों का उछाल कहीं अधिक तेज रहा है और कुछ प्रमुख बाजारों में यह पिछले वर्ष की तुलना में करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
इसलिए यह कहना कि पूरे देश में चीनी 50 प्रतिशत महंगी हो चुकी है, अभी उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से सही नहीं होगा। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि चीनी की कीमतों में असामान्य और चिंताजनक तेजी आई है, जिसने सरकार को हस्तक्षेप के लिए मजबूर कर दिया है।
दस साल बाद भारत को चीनी आयात क्यों करनी पड़ी?
सबसे बड़ा सवाल यही है।
20 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार ने करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी। यह कदम लगभग एक दशक बाद उठाया गया है। आयात की अनुमति 31 अक्टूबर 2026 तक है और इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाकर बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण पाना है।
जिस देश को कभी अपनी चीनी उत्पादन क्षमता पर गर्व रहा हो, वह यदि त्योहारी मौसम से पहले चीनी का आयात करने लगे तो यह केवल बाजार का सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं माना जा सकता। यह नीति-निर्माताओं के लिए भी एक गंभीर संकेत है।
सरकार का तर्क है कि घरेलू उत्पादन प्रारंभिक अनुमान से काफी कम रहने की आशंका है। चालू चीनी सीजन में उत्पादन का अनुमान लगभग 306 लाख टन कर दिया गया है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों के शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन थे। यानी उत्पादन अनुमान में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है।
क्या एथेनॉल ही चीनी महंगाई का कारण है?
यहीं से असली बहस शुरू होती है।
एथेनॉल को पेट्रोल में मिलाने की नीति का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, किसानों के लिए बाजार तैयार करना और प्रदूषण घटाना है। भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी E20 लक्ष्य हासिल किया है।
लेकिन जब गन्ने से चीनी के साथ-साथ एथेनॉल भी बनना शुरू हुआ, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठा कि कहीं गन्ने का एक हिस्सा ईंधन बनाने में जाने से चीनी की उपलब्धता तो प्रभावित नहीं हो रही?
यह सवाल गलत नहीं है। लेकिन वर्तमान सरकारी आंकड़े यह भी बताते हैं कि चीनी से एथेनॉल की ओर जाने वाला हिस्सा बढ़ने के बजाय घटा है। केंद्र के अनुसार 2022-23 में लगभग 12 प्रतिशत चीनी-समतुल्य उत्पादन एथेनॉल की ओर गया था, जो 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत रह गया। साथ ही, देश में उत्पादित एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेषकर मक्का, से आता है।
इसलिए वर्तमान चीनी संकट को केवल “एथेनॉल की मिलावट” या “एथेनॉल के कारण चीनी की कमी” कह देना तथ्यात्मक रूप से अधूरा होगा।
फिर चीनी महंगी क्यों हुई?
सरकार ने इसके पीछे कई कारण बताए हैं।
पहला कारण है—चीनी का अपेक्षा से कम उत्पादन।
दूसरा—गन्ने की फसल को प्रभावित करने वाली रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियां।
तीसरा—अत्यधिक बारिश और जलभराव से फसल को हुआ नुकसान।
चौथा—आने वाले त्योहारी मौसम में मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग।
पांचवां—अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की तंग आपूर्ति।
और छठा—कुछ क्षेत्रों में जमाखोरी और सट्टेबाजी की आशंका।
अर्थात तस्वीर बहुआयामी है। केवल एथेनॉल को कठघरे में खड़ा कर देना आसान है, लेकिन पूरी समस्या उससे कहीं बड़ी है।
सरकार को आखिर आयात का फैसला क्यों लेना पड़ा?
सरकार ने बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात का निर्णय लिया है। साथ ही चीनी व्यापारियों के लिए स्टॉक सीमा लागू की गई है। 1 अगस्त से 30 नवंबर तक डीलरों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा रखी गई है और 1 सितंबर से बड़े थोक उपभोक्ताओं को 15 दिन की खपत से अधिक चीनी रखने की अनुमति नहीं होगी। सरकार ने मिलों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन करने के लिए केंद्र और राज्यों की संयुक्त टीमें भी बनाई हैं।
यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आगामी महीनों में गणेश चतुर्थी, दशहरा, दीपावली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ने वाली है। सरकार चाहती है कि त्योहारों के मौसम में चीनी की कृत्रिम कमी पैदा न हो और कीमतें नियंत्रण से बाहर न जाएं।
पेट्रोल सस्ता हुआ या सिर्फ उसका मिश्रण बदला?
अब सवाल पेट्रोल पर भी होना चाहिए।
एथेनॉल मिश्रण को बढ़ाने का एक बड़ा उद्देश्य विदेशी कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता कम करना है। यह राष्ट्रीय हित से जुड़ा विषय है। लेकिन आम उपभोक्ता का सवाल इससे अलग है—
“यदि पेट्रोल में एथेनॉल बढ़ गया, तो मेरी जेब को उसका फायदा कितना मिला?”
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एथेनॉल नीति को केवल उत्पादन और मिश्रण प्रतिशत के आंकड़ों से नहीं, बल्कि उपभोक्ता के वास्तविक अनुभव से भी परखा जाना चाहिए।
अगस्त 2026 में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने भी E20 के साथ कम एथेनॉल मिश्रण वाले E10 ईंधन को फिर से उपलब्ध कराने की वकालत की है। उनका तर्क उपभोक्ता विकल्प और पुराने वाहनों से जुड़ी चिंताओं से संबंधित है। यह अपने आप में इस बात का संकेत है कि एथेनॉल नीति पर बहस अभी समाप्त नहीं हुई है।
गन्ने का असली गणित क्या है?
गन्ना किसान के लिए केवल फसल नहीं, उसकी आर्थिक जिंदगी का आधार है।
चीनी मिल के लिए गन्ना कच्चा माल है।
एथेनॉल उद्योग के लिए यह ईंधन का स्रोत है।
सरकार के लिए यह ऊर्जा सुरक्षा और किसान आय से जुड़ी नीति है।
और उपभोक्ता के लिए यही गन्ना कभी चीनी बनकर रसोई में आता है और कभी एथेनॉल बनकर वाहन की टंकी में।
यही कारण है कि गन्ने की पूरी अर्थव्यवस्था को केवल “चीनी बनाम एथेनॉल” के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा।
भारत को ऐसी नीति चाहिए जिसमें किसान को बेहतर मूल्य मिले, चीनी की घरेलू जरूरत सुरक्षित रहे, एथेनॉल