उदयपुर | आनंद मार्ग प्रचारक संघ, उदयपुर डायोसिस यूनिट के टेकरी-मादरी रोड स्थित जागृति परिसर में दिनांक 14 से 16 अगस्त 2026 तक द्वितीय चरण के त्रिदिवसीय डिट स्तरीय सामाजिक-आध्यात्मिक सेमिनार का आयोजन हुआ. सेमिनार का शुभारम्भ शुक्रवार को आनंद मार्ग के संस्थापक श्री श्री आनंदमूर्ति जी की प्रतिकृति पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलन द्वारा हुआ. तत्पश्चात सभी साधकों ने अष्टाक्षरी एक प्रहरीय अखंड कीर्तन 'बाबा नाम केवलम' के गायन द्वारा हरिपरिमण्डल का गठन किया. शनिवार तथा रविवार को सेमिनार के मुख्य प्रशिक्षक डॉ. एस. के. वर्मा द्वारा 'रूप और रूपातीत', 'भक्ति रूपसेतु', 'प्रउत' तथा सेमिनार की आवश्यकता आदि विषयों पर गहन चर्चा की गयी. डॉ. वर्मा ने बताया की ब्रह्म साधना द्वारा मनुष्य प्रकृति के बंधनो से मुक्त होकर परमपुरुष के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है. यह साधना सद्गुरु द्वारा सिद्ध किये गए इष्ट मन्त्र द्वारा ही संभव है तथा वास्तव में ब्रह्म ही सही मायनों में सद्गुरु हैं. जीव को शिव से मिलाने में भक्ति रूपी सेतु की आवश्यकता होती है, इसकी चर्चा करते हुए डॉ. वर्मा ने बताया की श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने कहा है की भक्ति ही एक साधक के जीवन का चरम लक्ष्य है जिसको प्राप्त करने में कर्म और ज्ञान साधना का थोड़ा ही मूल्य है. आनंद मार्ग के दर्शन शास्त्र 'आनंद सूत्रम' में 'प्रगतिशील उपयोगी तत्त्व' (प्रउत) के 16 सूत्रों की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया की यह सिद्धांत 99 प्रतिशत आध्यात्मिक है और सम्पूर्ण मानव समुदाय के जागतिक, मानसिक और आध्यत्मिक विकास की अवधारणा पर कार्य करता है. सेमिनार में डायोसिस तथा रीजनल सेक्रेटरी आचार्य ब्रजप्राणानंद अवधूत के निर्देशन में आसन, कौशिकी, तांडव, प्रभात संगीत, आवर्त कीर्तन, मिलित ईश्वर प्रणिधान, वर्णाध्यान,और स्वाध्याय पाठ हुआ. सेमिनार में उदयपुर, भिंडर, कानोड़, खेताखेड़ा, राजसमंद आदि से आये साधको ने भाग लिया.