उदयपुर। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष प्रोफेसर वासुदेव देवनानी ने कहा कि मेक इन इंडिया से आगे बढ़ते हुए डिजाइन एंड डवलप इन इंडिया का नारा देते हुए राष्ट्र को विकास के मार्ग पर अग्रसर होना होगा। इसके लिए अपने प्राचीन ज्ञान, वर्तमान प्रतिभा एवं उपलब्ध संसाधनों पर विश्वास करते हुए शोध एवं विकास का मार्ग अपनाना होगा। देवनानी बुधवार को देबारी स्थित होटल लोटस काउंटी में पश्चिम क्षेत्र के विश्वविद्यालयों के कुलगुरु सम्मेलन के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। सम्मेलन का विषय था स्वदेशी, आर्थिक राष्ट्रवाद एवं तकनीकी राष्ट्रवाद के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत।
अपने संबोधन में देवनानी ने कहा कि प्राचीन भारत में प्रत्येक गांव एक आत्मनिर्भर इकाई था। वे गांव उत्पादन के साथ-साथ ज्ञान एवं स्वावलंबन के केंद्र थे। देवनानी ने तक्षशिलादृनालंदा विश्वविद्यालय, प्राचीन शल्य चिकित्सक सुश्रुत, भारतीय आयुर्वेद की प्राचीन परंपरा, शून्य व दशमलव का आविष्कार, आर्यभट्ट व ब्रह्मभट्ट जैसे खगोलविद व गणितज्ञ आदि का उदाहरण देते हुए प्राचीन भारत की ज्ञान परंपरा का विस्तृत चित्र प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक भौतिक विज्ञान में यूनिफाइड फील्ड की अवधारणा हमारे वैदिक संप्रत्यय अहम् ब्रह्मास्मि प्रेरित है। उन्हें लोकल फॉर वोकल को आत्मनिर्भर भारत की नींव बताते हुए कहा कि इसी से आर्थिक राष्ट्रवाद आएगा। हमें इसे आगे बढ़ते हुए डिजाइन एंड डिवेलप इन इंडिया की बात करते हुए भारत में ही तकनीकी दक्षता हासिल करने एवं पूर्ण उत्पादन पर विशेष जोर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि 2014 में भारत विश्व में 11वीं अर्थव्यवस्था था जो आज चौथे स्थान पर है और शीघ्र ही तीसरे स्थान पर आ जाएगा। देवनानी ने भारत को अगली महाशक्ति कहने की बजाय मार्गदर्शक कहने पर जोर देते हुए कहा कि भारत महाशक्ति बनकर किसी पर शासन का अभिलाषी नहीं बल्कि प्राचीन काल की तरह मार्गदर्शन बनकर विश्व को मानव कल्याण की दिशा दिखाना चाहता है और शीघ्र ही वह दिन आयेगा।
समापन समारोह की अध्यक्षता प्रोफेसर विनय कुमार पाठक ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में अतुल कोठारी, राजेंद्र सिंह शेखावत एवं डॉ पंकज मित्तल उपस्थित रहे।
कुलगुरु विश्वविद्यालय की धुरी, नई पीढ़ी को करें प्रेरित
देवनानी ने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान की उच्चता के बारे में नई पीढ़ी को जानकारी देना आवश्यक है। इस कार्य में विश्वविद्यालयों के कुलगुरुओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे विश्वविद्यालयों की धुरी हैं। कुलगुरु राष्ट्रवाद की भावना आत्मसात करते हुए उसे अपने व्यवहार में उतारें जिससे विश्वविद्यालय में सकारात्मक माहौल बने और नई पीढ़ी इससे प्रेरणा लेकर राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका का निर्वहन कर पाए। उन्होंने विश्वविद्यालय में हो रहे शोध कार्य के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि पीएचडी के शोध का लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को मिलना चाहिए। भारत का भविष्य गांव में है और विश्वविद्यालय इस भविष्य की कहानी को अवश्य लिखेंगे।
Udaipur
‘डिजाइन एंड डवलप इन इंडिया का नारा आज की आवश्यकता’
‘अपने ज्ञान प्रतिभा एवं संसाधनों पर विश्वास कर आगे बढ़ना होगा’
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