कोरोना महामारी ने शिक्षा जगत को एक नई दिशा दी। ऑनलाइन कक्षाएँ, डिजिटल नोट्स, व्हाट्सएप समूह और मोबाइल आधारित अध्ययन उस दौर की आवश्यकता थे। परिस्थितियाँ असाधारण थीं, इसलिए अस्थायी व्यवस्थाएँ भी स्वीकार्य थीं। किंतु चिंता तब उत्पन्न होती है जब आपातकालीन उपाय स्थायी संस्कृति का रूप लेने लगें। आज अनेक विद्यालयों में डिजिटल होमवर्क और मोबाइल आधारित शैक्षणिक गतिविधियाँ इतनी सामान्य हो चुकी हैं कि यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या हम वास्तव में शिक्षा को आधुनिक बना रहे हैं, या अनजाने में उसे उसके मूल उद्देश्य से दूर ले जा रहे हैं?
शिक्षा का अर्थ केवल जानकारी का आदान-प्रदान नहीं है। यदि केवल सूचना प्राप्त करना ही शिक्षा होता, तो इंटरनेट दुनिया का सबसे बड़ा शिक्षक होता और विद्यालयों की आवश्यकता समाप्त हो जाती। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के भीतर विवेक, अनुशासन, जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और आत्मनिर्भरता का विकास करना है। यही वे गुण हैं जो एक विद्यार्थी को भविष्य का सजग नागरिक बनाते हैं।
दुर्भाग्य से आज होमवर्क का स्वरूप धीरे-धीरे इस मूल भावना से दूर जाता दिखाई दे रहा है। पहले विद्यार्थी अपनी डायरी में स्वयं गृहकार्य लिखते थे। वे शिक्षक के निर्देशों को ध्यानपूर्वक सुनते, उन्हें समझते और समय पर पूरा करने का प्रयास करते थे। यह प्रक्रिया केवल गृहकार्य लिखने तक सीमित नहीं थी, बल्कि जिम्मेदारी और आत्मानुशासन का प्रशिक्षण भी थी। आज अनेक स्थानों पर गृहकार्य सीधे अभिभावकों के मोबाइल पर भेज दिया जाता है। परिणामस्वरूप विद्यार्थी सीखने की प्रक्रिया का सक्रिय सहभागी कम और सूचना प्राप्त करने वाला निष्क्रिय उपभोक्ता अधिक बनता जा रहा है।
विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि बच्चे को हर सूचना मोबाइल के माध्यम से ही मिलनी है, तो उसकी स्मरण शक्ति, सुनने की क्षमता और आत्म-प्रबंधन का विकास कैसे होगा? क्या हम सुविधा प्रदान करते-करते उससे जीवन के महत्वपूर्ण कौशल नहीं छीन रहे?
तकनीक स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब तकनीक साधन से बढ़कर उद्देश्य बन जाती है। आज विद्यालय अनजाने में बच्चों को यह संदेश दे रहे हैं कि पढ़ाई का पहला माध्यम मोबाइल है। यही मोबाइल आगे चलकर मनोरंजन, गेम, सोशल मीडिया और अनियंत्रित डिजिटल आकर्षणों का द्वार भी बन जाता है। जिस उपकरण को हम शिक्षा का माध्यम बना रहे हैं, वही कई बार एकाग्रता भंग करने का सबसे बड़ा कारण बन जाता है।
सबसे गंभीर प्रश्न सामाजिक समानता का है। भारत जैसे विशाल देश में आज भी लाखों परिवार ऐसे हैं जहाँ प्रत्येक सदस्य के पास अलग मोबाइल उपलब्ध नहीं है। कई घरों में एक ही फोन पूरे परिवार की आवश्यकता पूरी करता है। ऐसे में यदि शिक्षा मोबाइल पर निर्भर हो जाए तो क्या सभी बच्चों को समान अवसर मिल पाएँगे? क्या डिजिटल व्यवस्था अनजाने में आर्थिक विषमता को और गहरा नहीं कर रही?
एक और विडंबना यह है कि आज का होमवर्क कई बार विद्यार्थियों से अधिक अभिभावकों की परीक्षा लेने लगा है। महंगे प्रोजेक्ट, रंगीन चार्ट, इंटरनेट से डाउनलोड सामग्री और आकर्षक प्रस्तुतियाँ अक्सर बच्चे नहीं, बल्कि माता-पिता तैयार करते हैं। ऐसे में अंक विद्यार्थी की योग्यता के नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक और तकनीकी क्षमता के प्रतीक बन जाते हैं। यह शिक्षा के मूल सिद्धांत—समान अवसर—के विपरीत है।
शिक्षक की भूमिका भी इस परिवर्तन से प्रभावित हुई है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शक होता है। उसका कार्य ज्ञान देने के साथ-साथ विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को गढ़ना भी है। यदि शिक्षक और छात्र के बीच संवाद मोबाइल संदेशों तक सीमित हो जाए तो शिक्षा का मानवीय पक्ष कमजोर पड़ना स्वाभाविक है। तकनीक शिक्षक का सहयोगी बन सकती है, उसका विकल्प नहीं।
आज आवश्यकता होमवर्क समाप्त करने की नहीं, बल्कि उसे सार्थक बनाने की है। गृहकार्य ऐसा हो जो बच्चे को सोचने, प्रश्न पूछने, अवलोकन करने और रचनात्मक बनने के लिए प्रेरित करे। यदि विज्ञान का विद्यार्थी पौधों का निरीक्षण करे, भाषा का विद्यार्थी परिवार के बुजुर्गों से बातचीत कर अनुभव लिखे, सामाजिक विज्ञान का विद्यार्थी अपने आसपास की समस्याओं का अध्ययन करे, तो ऐसा होमवर्क पुस्तक और मोबाइल दोनों की सीमाओं से आगे जाकर जीवन से जुड़ता है।
विद्यालयों को भी यह समझना होगा कि शिक्षा प्रतिस्पर्धा नहीं, विकास की प्रक्रिया है। होमवर्क की मात्रा नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण है। मोबाइल पर भेजे गए सौ संदेशों की तुलना में कक्षा में दिया गया एक प्रेरक विचार अधिक प्रभावशाली हो सकता है।
दरअसल, आज का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि होमवर्क डिजिटल हो या लिखित। वास्तविक प्रश्न यह है कि शिक्षा का केंद्र कौन है—तकनीक या विद्यार्थी? यदि तकनीक विद्यार्थी के विकास में सहायक है तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन यदि वही तकनीक उसकी एकाग्रता, आत्मनिर्भरता और सामाजिक विकास में बाधा बनने लगे तो पुनर्विचार आवश्यक है।
सभ्यता का विकास साधनों से होता है, लेकिन समाज का विकास मूल्यों से होता है। शिक्षा को यदि केवल तकनीकी सुविधा तक सीमित कर दिया गया तो हम कुशल उपयोगकर्ता तो तैयार कर लेंगे, किंतु संवेदनशील, जिम्मेदार और विचारशील नागरिक नहीं बना पाएँगे। इसलिए समय की मांग है कि शिक्षा व्यवस्था तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करे। यही संतुलन भविष्य की पीढ़ी को ज्ञानवान ही नहीं, बल्कि विवेकवान भी बनाएगा।
Udaipur
शिक्षा या स्क्रीन? : होमवर्क के बहाने बदलता बचपन
सुविधा की दौड़ में कहीं हम शिक्षा का मूल उद्देश्य तो नहीं खो रहे?
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