उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि संयम और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए शरीर से अधिक मन का मजबूत होना आवश्यक है।
शक्तिशाली तन न हो तो भी साधना संभव है, लेकिन कमजोर, हताश और निराश मन साधना के लिए उपयुक्त नहीं होता।
साधना के लिए वैराग्य, उत्साह और दृढ़ संकल्प से भरा मन चाहिए।साध्वी श्रीजी ने भगवान महावीर की साधना का स्मरण करते हुए कहा कि उनके मन में केवलज्ञान प्राप्त करने का प्रचंड उत्साह रहा होगा।
25वें भव में उनके हृदय में करुणा और भावना का उदय हुआ।
उन्होंने दया के दो स्वरूप द्रव्य दया और भाव दया बताते हुए कहा कि इंद्रियों एवं भौतिक सुविधाओं की चिंता करना द्रव्य दया है, जबकि आत्मा के कल्याण की चिंता करना भाव दया है।मृत्यु का एक क्षण सब कुछ यहीं छोड़ने को मजबूर कर देता हैउन्होंने कहा कि मनुष्य धन-दौलत, मकान और सुविधाओं को अपना मानकर उनके मोह में बंध जाता है, लेकिन मृत्यु के क्षण में नोटों के बंडल यहीं रह जाते हैं।
जिस समय मृत्यु का शिकंजा कसता है, उस समय व्यक्ति को कुछ संभालने का अवसर भी नहीं मिलता। कभी व्यक्ति सोता है और फिर नहीं उठता, तो कभी घर से निकला व्यक्ति वापस नहीं लौटता।
इसलिए जीवन रहते अपनी दिनचर्या में जागृति, आराधना और आत्मचिंतन को स्थान देना चाहिए।साध्वी श्रीजी ने संसार की नश्वरता को समझाते हुए कहा कि जैसे तेज हवा या तूफान पलभर में पक्षी का घोंसला बिखेर देता है, वैसे ही जीवन में परिस्थितियां कभी भी बदल सकती हैं।
मनुष्य मकान बनाने में वर्षों लगा देता है और उसके मोह में अपने मन को मैला करता रहता है।
लेकिन अंततः मकान वहीं रह जाता है और मनुष्य आगे की यात्रा पर निकल जाता है।संसार को समझें यात्रा की आरक्षित सीट की तरहसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने कहा कि होटल के कमरे में कोई चीज खराब हो जाए तो व्यक्ति उसे अपना स्थायी घर मानकर नहीं बैठता।
सरकारी वाहन में यात्रा करते समय सीट खराब हो तो भी उसे अपना वाहन नहीं मानता। यात्रा पूरी होने पर मंजिल आती है और व्यक्ति सीट छोड़कर आगे बढ़ जाता है।उन्होंने कहा कि संसार को भी इसी यात्रा की तरह समझना चाहिए।
जब तक यहां हैं, तब तक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करें और जीवन का सदुपयोग करें, लेकिन वस्तुओं और संबंधों के प्रति अत्यधिक मोह एवं आसक्ति न रखें।
जिस प्रकार यात्रा की सीट केवल यात्रा पूरी होने तक हमारी होती है, उसी प्रकार संसार की वस्तुएं भी कुछ समय के लिए हमारे उपयोग में आती हैं।उन्होंने कहा कि परलोक की यात्रा को सुखद बनाने के लिए वर्तमान जीवन में अच्छे कर्म, संयम, आराधना और आत्मचिंतन आवश्यक हैं।
जीवन की वास्तविक सफलता भौतिक संग्रह में नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ने में है। प्रवचन के दौरान साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भक्तिमय गीत प्रस्तुत किए।