राजस्थान में शहरी स्थानीय निकाय चुनाव का पहला चरण 9 सितंबर को पूरा हो गया। पहले चरण में 72.09 प्रतिशत वोटिंग की प्रारंभिक खबरें मिली है और 20 हजार से ज्यादा उम्मीदवारों की किस्मत ई वी एम में बंद हो गई है।

मतदान प्रतिशत के अन्तिम आंकड़े बाद में स्पष्ट हो जाएंगे। अब 11 सितंबर को दूसरे और अंतिम चरण का मतदान होगा।

इसके साथ ही प्रदेश के 309 नगरीय निकायों के 10,245 वार्डों में पार्षद चुनने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। दोनों चरणों की मतगणना 14 सितंबर को होगी।

पहले चरण में 162 नगरीय निकायों के 5,000 से अधिक वार्डों में मतदान सम्पन्न हुआ। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार मतदान 72 प्रतिशत से अधिक रहा, हालांकि कुछ स्थानों पर विवाद, झड़प और फर्जी मतदान के आरोप भी सामने आए।

इन घटनाओं के बावजूद व्यापक तस्वीर यही है कि मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लिया। अब पहले चरण के मतदान ने राजनीतिक दलों को दूसरे चरण के लिए भी संकेत दे दिए हैं।

पहले चरण के मतदान के बाद 11 सितंबर को दूसरे और अंतिम चरण में जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर, उदयपुर सहित प्रमुख शहरों के मतदाता अपने स्थानीय प्रतिनिधियों का फैसला करेंगे।

यह चुनाव केवल पार्षद चुनने की सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि राज्य की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में सरकार और प्रमुख विपक्षी दलों के लिए जमीनी जनसमर्थन की परीक्षा भी है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार पहले चरण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि स्थानीय चुनावों में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय मुद्दों के साथ-साथ सड़क, सफाई, पेयजल, सीवरेज, यातायात, स्ट्रीट लाइट, अतिक्रमण और नगरीय नियोजन जैसे प्रत्यक्ष सरोकार निर्णायक रहते हैं।

मतदाता अपने शहर और वार्ड में दिखाई देने वाले काम के आधार पर उम्मीदवारों का आकलन करते हैं।

इसलिए अब दूसरे चरण में दलों के बड़े नेताओं की सभाओं से अधिक महत्वपूर्ण बूथ स्तर की संगठनात्मक क्षमता और प्रत्याशियों का व्यक्तिगत जनसंपर्क रहेगा।दूसरे चरण में मुकाबला इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें प्रदेश के कई बड़े नगर निकाय शामिल हैं।

जयपुर नगर निगम के 150 वार्डों के अलावा जोधपुर और कोटा जैसे बड़े शहरों में भी मतदान होगा। अकेले जयपुर में लगभग 24.20 लाख मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।

इस चरण का परिणाम प्रदेश की शहरी राजनीतिक दिशा के बारे में अधिक स्पष्ट संकेत दे सकता है।

राजनीतिक जानकारों का मानेंगे है कि सत्तारूढ़ भाजपा के लिए चुनौती अपने संगठन, सरकार की उपलब्धियों और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व को स्थानीय स्तर पर समर्थन में बदलने की है।

पार्टी ने चुनावी अभियान में रोड शो और व्यापक संगठनात्मक सक्रियता पर जोर दिया है। कांग्रेस के सामने सत्ता पक्ष के विरुद्ध स्थानीय असंतोष को प्रभावी राजनीतिक विकल्प में बदलने और अपने संगठन को मजबूत करने की चुनौती है।

वहीं निर्दलीय अन्य छोटे दलों और स्थानीय प्रभाव वाले उम्मीदवार कई वार्डों में समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।

इन चुनावों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यहां दलों की तुलना में उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता कई बार अधिक निर्णायक हो जाती है। जातीय और सामाजिक समीकरण भी प्रभाव डालेंगे, लेकिन शहरी मतदाता की बदलती अपेक्षाएं अब विकास और बुनियादी सुविधाओं को अधिक महत्व दे रही हैं।

11 सितंबर का दूसरा चरण इसलिए केवल मतदान का दूसरा दिन नहीं, बल्कि राजस्थान की शहरी राजनीति की निर्णायक परीक्षा है। 14 सितंबर को मतगणना के बाद तस्वीर साफ होगी, लेकिन उससे पहले दोनों प्रमुख दलों के लिए सबसे बड़ी कसौटी यही है कि वे मतदाता को मतदान केंद्र तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचा पाते हैं।