गोपेन्द्र नाथ भट्टलोकतंत्र केवल बहुमत के शासन की व्यवस्था नहीं है। उसकी वास्तविक शक्ति उस संवाद में निहित है, जिसमें सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए जनहित के प्रश्नों पर गंभीर विचार-विमर्श करें।

असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक शक्ति है।

आवश्यकता इस बात की है कि असहमति विरोध और टकराव में बदलने के बजाय सार्थक संवाद का माध्यम बने तथा सदन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के मंच से आगे बढ़कर जनहित पर मंथन का सर्वोच्च संस्थागत मंच बने।राजस्थान विधानसभा में इस लोकतांत्रिक सोच को नई दिशा देने की उल्लेखनीय पहल विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने की है।

उनके प्रयासों से हर सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक आयोजित करने की परंपरा विकसित हुई है। संसद की तर्ज पर शुरू हुई यह पहल अब राजस्थान विधानसभा की संसदीय कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती दिखाई दे रही है।

स्पीकर देवनानी अब तक ऐसी छह सर्वदलीय बैठकें आयोजित कर चुके हैं और 20 अगस्त से प्रारंभ होने वाले सोलहवीं विधानसभा के छठें सत्र से पहले मंगलवार को आयोजित बैठक इसकी सातवीं कड़ी बनी है।

इस बैठक की खास बात यह रही कि सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लेकर पहल का स्वागत किया और सदन के सुचारू संचालन तथा स्वस्थ संसदीय परंपराओं के लिए इसे उपयोगी माना।

यह पहल इस सोच को मजबूत करती है कि सदन चलाने की जिम्मेदारी केवल अध्यक्ष की नहीं, बल्कि प्रत्येक राजनीतिक दल और प्रत्येक सदस्य की सामूहिक जिम्मेदारी है।इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि विधानसभा में विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने और जनहित के मुद्दे उठाने का पूरा अधिकार है।

वहीं सरकार का दायित्व है कि वह इन सवालों को गंभीरता से लेते हुए उनका जवाब दे और समाधान की दिशा में प्रयास करे हालांकि प्रतिपक्ष को भी सरकार के जवानो को शांति और धैर्य पुर्वक सुनने के लिए तैयार होना चाहिए।

विधानसभा अध्यक्ष देवनानी का यह आग्रह कि विपक्ष नियमों के अनुरूप जनहित के मुद्दे उठाए और सरकार उनके समाधान का पूरा प्रयास करे, संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना को रेखांकित करता है।

तीखी बहस और राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन इनके बीच सदन की मर्यादा, आसन का सम्मान और संसदीय भाषा की गरिमा कायम रहना भी उतना ही आवश्यक है।विधानसभाध्यक्ष देवनानी द्वारा सभी सदस्यों को चर्चा के दौरान पर्याप्त समय देने का आश्वासन देना भी महत्वपूर्ण है।

लोकतंत्र में केवल बोलने का अधिकार पर्याप्त नहीं, बल्कि अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने का अवसर मिलना भी जरूरी है।

जब विपक्ष को पर्याप्त अवसर मिलेगा और सरकार जनहित के प्रश्नों का जवाब देगी, तो टकराव के स्थान पर सार्थक विचार-विमर्श की संभावनाएं बढ़ेंगी और बेहतर नीतियों का मार्ग प्रशस्त होगा।संसदीय लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अवश्य हैं, लेकिन जनहित के व्यापक उद्देश्य में दोनों सहयात्री भी हैं।

नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सर्वदलीय बैठक में सदन में उठाई गई बातों को सरकार द्वारा गंभीरता से लेने तथा सदन चलाने में पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों की जिम्मेदारी पर जोर दिया।

संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने भी विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की सर्वदलीय बैठक बुलाने की पहल को महत्वपूर्ण और सार्थक प्रयास बताया।

पक्ष प्रतिपक्ष के विभिन्न दलों की यह स्वीकार्यता इस परंपरा की सबसे बड़ी सफलता है।राजस्थान विधानसभा अपने 75वें वर्ष के अमृत महोत्सव काल से गुजर रही है।

इस अवसर पर अध्यक्ष देवनानी द्वारा 2952 से अब तक के 400 से अधिक पूर्व और वर्तमान विधायकों को एक मंच पर लाकर विधानसभा की सात दशक से अधिक लंबी संसदीय यात्रा को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास करना भी उल्लेखनीय है।

यह विरासत केवल भवनों, चुनावों और सरकारों की कहानी नहीं, बल्कि उन जनप्रतिनिधियों की यात्रा है जिन्होंने अलग-अलग समय में राजस्थान की जनता की आवाज सदन तक पहुंचाई।देवनानी के इस प्रयास को उप राष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी सराहा है।

आज जब राजनीतिक विमर्श में असहमति कई बार कटुता में बदलती दिखाई देती है, तब सर्वदलीय बैठकों से निकलने वाला संदेश विशेष महत्व रखता है कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मनभेद लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए नुकसानदेह हैं।

सदन में बहस होनी चाहिए, लेकिन संवाद के साथ, विरोध होना चाहिए, लेकिन मर्यादा के साथ,सरकार से सवाल होने चाहिए, लेकिन जवाब सुनने का धैर्य भी होना चाहिए।20 अगस्त गुरुवार से शुरू हो रहे राजस्थान विधानसभा के मानसून सत्र से पहले हुई सातवीं सर्वदलीय बैठक ने एक सकारात्मक वातावरण तैयार किया है।

जनता भी विधानसभा में केवल हंगामा नहीं, समाधान चाहती है। वह चाहती है कि उसके जन प्रतिनिधि उसकी समस्याओं को उठाएं, राज्य सरकार उन पर जवाब दे और सदन समाधान की दिशा में आगे बढ़े।

विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी लंबित प्रश्नों के सरकार से जवाब दिलाने के लिए भी प्रो एक्टिव भूमिका निभा रहें हैं।राजस्थान विधानसभा के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर यदि सर्वदलीय संवाद की यह परंपरा और मजबूत होती है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए मूल्यवान संसदीय विरासत बन सकती है।

लोकतंत्र की खूबसूरती केवल सहमति में नहीं, बल्कि असहमति के बावजूद साथ बैठकर रास्ता निकालने की क्षमता में है।

सदन की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितनी बैठकें हुई और कितनी बार आवाजें ऊंची हुईं, बल्कि इससे होती है कि उन आवाजों में से कितनी जनता की समस्याओं के समाधान तक पहुंचीं।इसलिए उम्मीद करना चाहिए कि आने वाले विधानसभा के मानसून सत्र में संवाद से सदन सधेगा, एवं आपसी सहमति से चलेगा और मर्यादा से राजस्थान की संसदीय परंपरा और अधिक समृद्ध होगी।