कोटा। जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन समाज की सेवा, लोगों के सुख-दुख में सहभागिता और जनकल्याण के लिए समर्पित कर दिया हो, वह दुनिया से विदा होने के बाद भी समाज को प्रेरणा दे सकता है।

खातौली के लोकप्रिय जनप्रतिनिधि एवं चार बार सरपंच रहे श्री शंभू दयाल शर्मा ने अपने जीवन की इसी प्रेरणादायक यात्रा को अंतिम समय में भी एक महान संदेश देकर अमर कर दिया।उनके निधन के बाद पत्नि रामेश्वरी देवी,बेटे कपिल शर्मा ने उनका नेत्रदान करवाकर मानवता और सेवा की एक ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जिसने पूरे क्षेत्र को भावुक कर दिया।समाजसेवी, हँसमुख, विनम्र और हर व्यक्ति के सुख-दुख में सहयोग करने वाले श्री शर्मा का शुक्रवार को आकस्मिक निधन हो गया।

जीवनभर जनसेवा करने वाले शर्मा जी की अंतिम विदाई भी समाज के लिए एक नई रोशनी का संदेश बन गई।पुत्र ने निभाई पिता की सेवा और संस्कारों की विरासतश्री शंभू दयाल शर्मा के निधन के बाद उनके नेत्रदान संकल्पित सुपुत्र कपिल शर्मा, जो स्वयं लंबे समय से सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं, ने अपने पिता का नेत्रदान करवाने का निर्णय लिया।

परिवार के सदस्य एवं शाइन इंडिया फाउंडेशन के ज्योति मित्र अंजनी शर्मा की समझाइश पर तथा माता श्रीमती रामेश्वरी देवी की सहमति से परिवार ने इस पुण्य कार्य को संपन्न कराया।यह निर्णय केवल नेत्रदान का नहीं था, बल्कि पिता के जीवनभर किए गए समाजसेवा के संस्कारों को आगे बढ़ाने का भी एक भावपूर्ण संकल्प था।

एक पिता, जिसने जीवनभर समाज की सेवा की, उसके जाने के बाद पुत्र ने उनके नेत्रों के माध्यम से किसी और के जीवन में रोशनी पहुंचाने का निर्णय लेकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी।रक्षाबंधन के पर्व पर भी नहीं रुका सेवाभावज्योति मित्र अंजनी शर्मा ने जब कोटा में शाइन इंडिया फाउंडेशन एवं ईबीएसआर कोटा चैप्टर के कॉर्डिनेटर डॉ. कुलवंत गौड़ को नेत्रदान की सूचना दी, उस समय डॉ. गौड़ रक्षाबंधन के पर्व पर अपनी बहनों के आने और राखी बंधवाने की प्रतीक्षा कर रहे थे।लेकिन जैसे ही नेत्रदान की सूचना मिली, उन्होंने सेवा को प्राथमिकता देते हुए तुरंत अपनी नेत्र संकलन वाहिनी ‘ज्योति रथ’ लेकर यात्रा शुरू कर दी।

करीब डेढ़ घंटे तक लगभग 120 किलोमीटर की दूरी तय कर, इटावा से अपने दो सहयोगी मित्र देवेंद्र जैन एवं डॉ. विकल्प नागर को साथ लेकर वे खातौली पहुंच गए और समय रहते श्री शर्मा जी का नेत्रदान संपन्न कराया।नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी करने के बाद रात 8 बजे डॉ. गौड़ वापस लौटे और फिर रक्षाबंधन का पारिवारिक दस्तूर निभाया।

यह दृश्य स्वयं में एक संदेश था कि, रिश्तों की मिठास और मानवता की सेवा—दोनों जीवन के सबसे अनमोल पर्व हैं।ग्रामीणों ने प्रत्यक्ष देखी नेत्रदान की प्रक्रियाडॉ. गौड़ और उनकी टीम के इस सेवाभाव को देखकर वहां उपस्थित ग्रामीणों में भी नेत्रदान के प्रति जिज्ञासा और जागरूकता बढ़ी।

कई लोगों ने पहली बार नेत्रदान की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से देखा और समझा कि मृत्यु के बाद किया गया नेत्रदान किसी जरूरतमंद व्यक्ति के जीवन से अंधकार दूर कर सकता है।शाइन इंडिया फाउंडेशन की टीम ने उपस्थित लोगों को नेत्रदान की प्रक्रिया और उसके महत्व के बारे में जानकारी दी तथा बताया कि नेत्रदान एक ऐसा अमर उपहार है, जो किसी दिवंगत व्यक्ति की विदाई के बाद भी किसी जरूरतमंद के जीवन में रोशनी का कारण बन सकता है।जनसेवा का लंबा और प्रेरणादायक सफरश्री शंभू दयाल शर्मा जनसंघ के समय से सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे।

वर्ष 1976 से लगातार चार बार सरपंच रहे और वर्ष 2005 में अपनी पत्नी श्रीमती रामेश्वरी देवी को भी सरपंच बनवाया।उनका जीवन सादगी, ईमानदारी, विनम्रता और जनसेवा की मिसाल रहा।

आज उनके नेत्रदान ने उनके व्यक्तित्व को एक और नई पहचान दी है—जीवनभर समाज के लिए जिए और जाते-जाते भी किसी के जीवन में रोशनी की उम्मीद छोड़ गए।नेत्रदान के उपरांत संस्था सदस्यों ने परिवार के इस प्रेरणादायक व पुनीत कार्य के लिए सभी का धन्यवाद अर्पित किया ।