लेखक - भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर

विश्व दयालुता दिवस पर आज मन स्वयं से एक प्रश्न पूछता है-क्या सचमुच हमारा समाज दयालु है? क्यों हमारे चारों ओर ऐसी घटनाएँ घटती हैं, जो मानवीय संवेदना को झकझोर देती हैं? हर रोज कहीं मासूमों पर अत्याचार, तो कहीं निर्दोषों के रक्तपात की दुःखद घटनाएं हो जाती हैं। ज्ञातव्य है कि पहलगाम में 26 निश्छल जिंदगियों का अंत और हाल ही में दिल्ली ब्लास्ट की घटना में 11 लोगों दुःखद मौत व एक नवजात शिशु की निर्ममता से हत्या। ये घटनाएँ  झकझोर देती है। उसी क्षण मन पूछता है- संवेदना और दयालुता कहाँ खो गई? करुणा का स्रोत क्यों सूखने लगा?

 

वर्तमान का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि दयालुता की चर्चा तो सर्वत्र सुनाई देती है, किन्तु उसका सच्चा स्वरूप दिन-प्रतिदिन दुर्लभ होता जा रहा है। दिखावे की चकाचौंध में मानवीय स्पर्श की उष्मा कहीं धुँधली पड़ गई है। सोशल मीडिया के मंच पर हम दया के उदाहरण और प्रेरक वचनों से तो भरे रहते हैं, परंतु जीवन के वास्तविक धरातल को दया कठोरता, उदासीनता और स्वार्थ की धूल में दबी पाते हैं। संवेदनशील होना अब मानो प्रदर्शन का विषय बन गया है, आचरण का नहीं।

 

स्टोइक दर्शन के महापुरुष मार्कस ऑरेलियस ने कहा है - "दयालुता अजेय है, जब तक कि उसमें चापलूसी या पाखंड न हो।" यह केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि दया की शुचिता का मापदंड भी है। दया यदि स्वार्थ, लाभ या प्रशंसा की इच्छा से उपजे, तो वह दया नहीं—केवल आडंबर है। वे कहते हैं— "मनुष्य दयालुता के कार्यों के लिए ही जन्मा है।" यानी दया मनुष्य की प्रकृति है, और कठोरता उसका विकार।

भारतीय चिंतन में दया को धर्म की जड़ माना गया है। इसीलिए रामचरित्र मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं—

दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान ।

तुलसी दया न छोड़िए, जब लगि घट में प्राण।।

दया वह पुष्प है जिसकी सुगंध से हृदय में करुणा का उदय होता है। जहाँ करुणा बहती है, वहीं ईश्वर का निवास होता है।

 

क्यों घट रही है दया?- आज समाज की गति तेज है, जीवन की दौड़ निरंतर है, और मन थका हुआ। भौतिक उपलब्धियों की चमक ने भावनाओं की सरलता को धुँधला कर दिया है। रिश्ते औपचारिक हो रहे हैं, संवाद सतही, और दिलों के बीच अदृश्य दीवारें खड़ी हो चुकी हैं। प्रतिस्पर्धा ने सहानुभूति को पीछे धकेल दिया है। इसलिए समाज के भीतर अवसाद, बेचैनी और अकेलापन बढ़ रहा है।

 

दयालुता इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वह मन को हल्का करती है, हृदय को शांत करती है और समाज में विश्वास का ताना-बाना बुनती है। यह न केवल दूसरों को सुख देती है, बल्कि देने वाले को भी गहरी आंतरिक प्रसन्नता प्रदान करती है। दयालुता मनुष्य के भीतर की रोशनी है-जो स्वयं भी आलोकित होती है और अँधेरे को भी कोमलता से उजाला देती है। दयालु होना कोई महान पराक्रम नहीं-यह छोटे-छोटे कर्मों में प्रकट होती है। किसी दुःखी की बात ध्यान से सुनना, असहाय की सहायता कर देना,कटु शब्दों के स्थान पर कोमल शब्द चुन लेना, और क्रोध के क्षण में मौन और शांति को चुन लेना- दया है। क्रोध में तीव्र होना वीरता नहीं, दया में दृढ़ रहना ही सच्ची मानवता है। दया ही धर्म है-जहाँ दया है, वहाँ धर्म है। जहाँ दया है, वहाँ ईश्वर है। जहाँ दया है, वहाँ मनुष्यता जीवित है।

 

आइये इस विश्व दयालुता दिवस पर आत्मचिंतन करे। क्या हम वास्तव में दयालु हैं? या केवल दयालु दिखना चाहते हैं? यदि जीवन में दया का एक बीज भी बो दिया जाए तो यह धरती थोड़ी और सहनशील,थोड़ी और शांत,थोड़ी और सुंदर हो सकती है। क्योंकि दया केवल एक गुण नहीं-यह मनुष्य होने का प्रमाण है।