क्या साक्ष्य मिटाकर पशु क्रूरता पर डाला गया पर्दा?

उदयपुर (चेतक) स्थित बहुउद्देश्यीय पशु चिकित्सालय में पक्षियों, विशेषकर कबूतरों, के साथ हो रही कथित पशु क्रूरता अब व्यक्तिगत लापरवाही से आगे बढ़कर संस्थागत जिम्मेदारी और साक्ष्य मिटाने के गंभीर आरोपों तक पहुंच गई है। इस पूरे मामले के केंद्र में अस्पताल के संयुक्त निदेशक डॉ. सुरेश जैन का नाम सामने आ रहा है, जिनकी भूमिका पर पशु प्रेमियों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

पिंजरे हटे, कबूतर गायब — सवालों में संयुक्त निदेशक

पशु प्रेमियों द्वारा राजस्थान राज्य जीव-जंतु कल्याण बोर्ड, जयपुर को सौंपी गई शिकायत के अनुसार, बहुउद्देश्यीय पशु चिकित्सालय, उदयपुर (चेतक) परिसर में पहले मौजूद कबूतरों के पिंजरे अचानक पूरी तरह हटा दिए गए। यह कार्रवाई उस समय की गई जब कई कबूतर गंभीर रूप से बीमार थे और उड़ान भरने में अक्षम थे।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था, बिना डिस्चार्ज रिकॉर्ड और बिना उपचार पूर्ण किए इन पक्षियों को कहां और किसके आदेश से हटाया गया?
पशु प्रेमियों का आरोप है कि यह निर्णय संयुक्त निदेशक डॉ. सुरेश जैन की जानकारी अथवा निर्देश के बिना संभव नहीं था।

“ऊपर से आदेश हैं” — लेकिन लिखित आदेश कहां?

दिनांक 23 दिसंबर 2025 को एक गंभीर रूप से बीमार कबूतर को बहुउद्देश्यीय पशु चिकित्सालय, उदयपुर (चेतक) लाने पर ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सक द्वारा कथित रूप से कहा गया—

“अब हम कबूतर नहीं रखते, पिंजरा हटा दिया गया है… ऊपर से आदेश हैं।”

यह “ऊपर” कौन है?
क्या ये आदेश संयुक्त निदेशक डॉ. सुरेश जैन द्वारा मौखिक रूप से दिए गए?
यदि हां, तो लिखित आदेश, फाइल नोटिंग या विभागीय निर्देश सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए?

इलाज से इनकार = पशु क्रूरता?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी सरकारी पशु चिकित्सालय द्वारा घायल या बीमार पक्षी को उपचार से इनकार करना पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 11 के अंतर्गत दंडनीय अपराध है।

ऐसे में सवाल उठता है—

  • क्या संयुक्त निदेशक होने के नाते डॉ. सुरेश जैन ने अपने वैधानिक दायित्वों का पालन किया?

  • या फिर जानबूझकर पक्षियों की चिकित्सा एवं देखरेख व्यवस्था समाप्त कर दी गई?

ताले में बंद पशु, रोकी गई पहुंच

पशु प्रेमियों का यह भी आरोप है कि बहुउद्देश्यीय पशु चिकित्सालय, उदयपुर (चेतक) परिसर में पशुओं को ताले में बंद रखा जा रहा है, जिससे भोजन-पानी तथा पशु स्वामियों एवं पशु प्रेमियों की पहुंच बाधित होती है।
यह स्थिति न केवल अमानवीय है, बल्कि प्रशासनिक मनमानी और जवाबदेही के अभाव को भी दर्शाती है।

साक्ष्य मिटाने की आशंका

पिंजरों का अचानक हटाया जाना, उपचाराधीन कबूतरों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध न होना और मौखिक आदेशों का हवाला—इन सभी तथ्यों ने साक्ष्य नष्ट किए जाने की गंभीर आशंका को जन्म दिया है।

पशु प्रेमियों का स्पष्ट कहना है कि

“यदि पिंजरे हटाए गए हैं, तो यह संयुक्त निदेशक डॉ. सुरेश जैन की जानकारी और जिम्मेदारी के बिना संभव नहीं हो सकता।”

राज्य जीव-जंतु कल्याण बोर्ड पहले दे चुका है जांच के निर्देश

उल्लेखनीय है कि राजस्थान राज्य जीव-जंतु कल्याण बोर्ड द्वारा इस प्रकरण को गंभीर मानते हुए पहले ही संबंधित विभाग को जांच एवं नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश जारी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस और पारदर्शी कार्रवाई सामने नहीं आई है।

अब मांग — संयुक्त निदेशक की भूमिका की स्वतंत्र जांच

पशु प्रेमियों की प्रमुख मांगें हैं—

  • संयुक्त निदेशक डॉ. सुरेश जैन की भूमिका की स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच

  • कबूतरों को कहां और किस स्थिति में हटाया गया, इसका स्पष्ट खुलासा

  • उपचाराधीन पक्षियों का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए

  • दोष सिद्ध होने पर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई

 

अब सवाल केवल यह नहीं है कि कबूतर कहां गए,
सवाल यह है कि क्या बहुउद्देश्यीय पशु चिकित्सालय, उदयपुर (चेतक) में पशु क्रूरता को प्रशासनिक आदेशों की आड़ में दबाया जा रहा है?