उदयपुर । “जिस भाषा में रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथ रचे गए, जिसकी आवश्यकता आज संपूर्ण विश्व अनुभव कर रहा है, उस संस्कृत को हम भारतीय क्यों छोड़ें?”
यह बात आपदा राहत विभाग के भाजपा प्रदेश संयोजक एवं राजस्थान गौरव सम्मान से सम्मानित डॉ. जिनेन्द्र शास्त्री ने संस्कृत संभाषण शिविर के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने संस्कृत को देवभाषा बताते हुए आह्वान किया कि संस्कृत केवल ग्रंथों तक सीमित न रहे, बल्कि जन-जीवन की व्यवहारिक भाषा बने। संस्कृत के माध्यम से ही सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा और राष्ट्र की बौद्धिक चेतना का जागरण संभव है।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और दर्शन की आत्मा है। आज जब विश्व संस्कृत की ओर आकृष्ट हो रहा है, तब भारतवासियों का दायित्व है कि वे इसे अपने जीवन का अंग बनाएं। उन्होंने संस्कृत को जीवन की भाषा बनाने का आह्वान किया।
संस्कृत भारती द्वारा 10 दिवसीय पाठ्यक्रम के अंतर्गत आयोजित संस्कृत संभाषण शिविर का समापन मंगलवार को प्रातः 11:00 बजे राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, देवाली में हुआ। समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. जिनेन्द्र शास्त्री उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि डाक विभाग में जनसम्पर्क निरीक्षक एल.डी. शर्मा ने संस्कृत को भारतीय संस्कृति के संवर्धन का आधार बताते हुए कहा कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसी भावना भारतीय संस्कृति की आत्मा है और संस्कृत हमारे उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अत्यंत सहायक है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्कृत भारती के प्रान्त सम्पर्क प्रमुख यज्ञ आमेटा ने कहा कि संस्कृत भारत की आत्मा है और इसके व्यावहारिक उपयोग को बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को संस्कृत को दैनिक जीवन में अपनाने तथा समाज में इसके प्रचार-प्रसार का संकल्प भी दिलाया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ। इसके पश्चात विद्यालय की बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। गृह मंत्र का वाचन नेहल कुमावत द्वारा किया गया। अतिथियों का परिचय एवं स्वागत प्राचार्य दुष्यन्त नागदा ने किया। छात्राओं द्वारा प्रस्तुत शिविर गीत “पठत संस्कृतम्… वदत संस्कृतम्” ने सम्पूर्ण वातावरण को संस्कृतमय कर दिया।
इसके उपरान्त प्रफुल्ल एवं नेहल ने संस्कृत माध्यम में अपने शिविर अनुभव साझा किए। संस्कृत भारती महानगर विस्तारक गौरव साहू ने एकल गीत के रूप में “पूर्ण विजय संकल्प…” प्रस्तुत कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का सम्पूर्ण संचालन संस्कृत भाषा में गौरव साहू द्वारा किया गया, जो स्वयं में संस्कृत संभाषण की जीवंत मिसाल रहा।
इस अवसर पर खुशी, समूह तथा नीरज-जानवी द्वारा दूरवाणी संवाद एवं अतिथि संभाषण पर आधारित नाट्य प्रस्तुति दी गई, जिसने दर्शकों को संस्कृत की व्यावहारिक उपयोगिता से प्रभावी रूप से परिचित कराया।
कार्यक्रम के संयोजक एवं विद्यालय के प्राचार्य दुष्यन्त नागदा रहे। समापन से पूर्व सभी बालकों एवं अतिथियों द्वारा मां सरस्वती का पुष्पार्चन किया गया। अंत में प्राचार्य दुष्यन्त नागदा ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए संस्कृत संभाषण को जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर उदयपुर महानगर में संस्कृत भारती द्वारा प्रस्तावित 51 संस्कृत संभाषण शिविरों के अभियान को समर्थन देते हुए पेसिफिक विश्वविद्यालय के चेयरमैन राहुल अग्रवाल एवं निदेशक अमन अग्रवाल ने शुभकामनाएं प्रेषित कीं तथा संस्कृत के इस पुण्य कार्य में निरंतर सहयोग का आश्वासन दिया।
मुख्य शिक्षक व शिविर संचालक महानगर विस्तारक गौरव साहू ने बताया कि यह शिविर 8 जनवरी से 20 जनवरी के बीच 10 दिवसीय रूप में प्रतिदिन 2 घंटे संचालित किया गया, जिसमें विद्यालय के 38 छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। शिविर के दौरान व्याकरण, संभाषण एवं दैनिक दिनचर्या से जुड़े सरल व व्यावहारिक संवाद कौशल सिखाए गए।
शिविर संचालन आदि विभिन्न व्यवस्थाओं में संजय शांडिल्य ,श्रीयांश कंसारा, नरेंद्र शर्मा ,डॉ रेनू पालीवाल, चैनशंकर दशोरा, भगवती शंकर व्यास, मंगल कुमार जैन, कुलदीप जोशी, विकास डांगी, भूपेंद्र शर्मा, सहित अनेक स्वयंसेवकों का सक्रिय योगदान रहा।