उदयपुर। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर रविवार 21 जून 2026 को आनंद मार्ग प्रचारक संघ (एएमपीएस), उदयपुर इकाई द्वारा राजस्थान के उदयपुर स्थित जागृति में परिचर्चा का आयोजन किया गया। भुक्ति प्रधान डॉ. एस. के. वर्मा ने योग तथा योगासन की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने योग के वास्तविक अर्थ से जुड़ी भ्रांतियों का निराकरण किया है। योग का अर्थ "एक और एक मिलकर दो होना" नहीं, बल्कि "एक और एक मिलकर एक हो जाना" है। शास्त्रों में योग की परिभाषा दी गई है— “संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मा परमात्मनः” अर्थात जीवात्मा और परमात्मा का मिलन ही योग है। जिस प्रकार चीनी पानी में घुलकर एक हो जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की इकाई चेतना का परम चेतना में विलय ही योग का वास्तविक अर्थ है। यह विलय केवल मनो-आध्यात्मिक ध्यान (साइको-स्पिरिचुअल मेडिटेशन) की प्रक्रिया द्वारा ही संभव है। डॉ. वर्मा ने बताया कि योगासन, महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग साधना का केवल तीसरा अंग है और यह मुख्यतः शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए सहायक होता है। अतः इस सन्दर्भ में इस दिवस को योग दिवस के बजाय योगासन दिवस कहना अधिक उपयुक्त होगा ।
इस अवसर पर घाना,अफ्रीका से पधारे एएमपीएस के केंद्रीय प्रशिक्षक आचार्य सत्याश्रयानन्द अवधूत ने कहा की श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने योग और तंत्र साधना के श्रेष्ठ तत्वों का समन्वय कर 'राजाधिराज योग साधना' का प्रतिपादन किया तथा वर्ष 1955 में आनंद मार्ग प्रचारक संघ (एएमपीएस) की स्थापना की। एएमपीएस के साधक नियमित रूप से प्रतिदिन दो बार योग साधना (ध्यान) करते हैं तथा योग्य आचार्य द्वारा निर्धारित उपयुक्त आसनों का अभ्यास करते हैं। इन आसनों का उद्देश्य अंतःस्रावी ग्रंथियों (एंडोक्राइन ग्लैंड्स) के स्राव को संतुलित करना है, जिससे ध्यान-साधना को सहयोग मिल सके। यह संपूर्ण प्रणाली जैव-मनोविज्ञान (बायोसाइकोलॉजी) के वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने बताया कि आसनों के अभ्यास से पूर्व कुछ सावधानियों का पालन आवश्यक है। उदाहरणस्वरूप, पुरुषों को लंगोट तथा महिलाओं को शरीर से सटे हुए अंतःवस्त्र पहनने चाहिए। आसनों का अभ्यास खुले स्थान में, भरे पेट या भोजन के तुरंत बाद नहीं करना चाहिए। आसन तभी करने चाहिए जब बाईं नासिका (चंद्र स्वर) सक्रिय हो। साथ ही, आसन करने के तुरंत बाद जल का स्पर्श भी नहीं करना चाहिए।
कार्यक्रम में उपस्थित आध्यात्मिक साधकों ने सामूहिक मनो-आध्यात्मिक ध्यान (योग) का अभ्यास कर योग दिवस को उसके वास्तविक स्वरूप में मनाया। कार्यक्रम के अंत में जी. एल. सोनी ने सभी का आभार व्यक्त किया तथा कहा कि एक आध्यात्मिक साधक के लिए वर्ष का प्रत्येक दिन योग दिवस होता है।