कोटा। समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत की राजस्थान प्रांत की धौलपुर इकाई द्वारा आयोजित भव्य सम्मान समारोह एवं काव्य गोष्ठी में संस्थान की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शशि जैन ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की।
इस अवसर पर उन्होंने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में कहा कि “साहित्य समाज को जोड़ता है, तोड़ता नहीं। साहित्यकार के शब्दों से ही समाज का निर्माण होता है।
साहित्य का धर्म मानवता को जोड़ना और समाज में प्रेम, सद्भाव एवं समरसता की चेतना जगाना है।”
डॉ. शशि जैन ने कहा कि शब्दों में अपार शक्ति होती है। साहित्य टूटे हुए मन को जोड़ने का कार्य करता है और एक सच्चे कलमकार की लेखनी समाज को जोड़ने वाला सेतु होनी चाहिए, न कि विभाजन का कारण। उन्होंने कहा कि जहां साहित्य होता है, वहां प्रेम, सद्भाव, संवेदना और समरसता का विस्तार स्वतः होने लगता है।
कार्यक्रम का आयोजन संस्थान के संस्थापक एवं प्रेरणास्रोत डॉ. मुकेश कुमार व्यास ‘स्नेहिल’डॉ प्रभात कुमार सिंघल मुख्य कार्यकारी अधिकारी, श्री आनंद जैन अकेला राष्ट्रीय महामंत्री के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से राष्ट्रीय सचिव श्रीमती रजनी शर्मा तथा राजस्थान प्रांतीय अध्यक्ष श्री गोविंद गुरु जी के नेतृत्व में किया गया।
सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि डॉ. शशि जैन द्वारा गोविंद गुरु जी, रजनी शर्मा जी, वीरेंद्र त्यागी जी, मुरारी लाल शर्मा जी, राजेश शर्मा जी, अनुसूइया जी, प्रिया शुक्ला जी, नंदिनी जी, पूर्णिमा जी, हेमवती ‘हेमा’ जी, गौरव जी एवं प्रिय रुद्रप्रताप को प्रतिष्ठित “समरस प्रेम-पुष्प कलमकार गौरव सम्मान–2026” से सम्मानित किया गया।
साथ ही सम्मानित साहित्यकारों एवं कलमकारों को संस्थान की साहित्यिक कृति “प्रेम-पुष्प–2” भी भेंट की गई।
सम्मान समारोह के पश्चात आयोजित भव्य काव्य गोष्ठी में उपस्थित साहित्यकारों एवं कलमकारों ने अपनी उत्कृष्ट एवं भावपूर्ण रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कविता, गीत, ग़ज़ल एवं विभिन्न साहित्यिक विधाओं की प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को साहित्यिक रस और भावनात्मक ऊर्जा से सराबोर कर दिया।
कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम संयोजिका एवं राष्ट्रीय सचिव श्रीमती रजनी शर्मा तथा राजस्थान प्रांतीय अध्यक्ष श्री गोविंद गुरु जी ने सभी आगंतुक अतिथियों, साहित्यकारों एवं कलमकारों का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की सफलता के लिए सभी को धन्यवाद दिया।
यह आयोजन साहित्य, सम्मान और समरसता का एक ऐसा सुंदर संगम बना, जिसने डॉ. शशि जैन के इस संदेश को सार्थक किया कि— “साहित्य जोड़ता है, तोड़ता नहीं; शब्दों से ही बनता है समरस समाज।”