उदयपुर। देवेन्द्रधाम में महावीर समोशरण में प्रवचन देते हुए डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि भारत तप, त्याग और आध्यात्मिक साधना की पवित्र भूमि रही है।

इस धरती पर हजारों-हजार तपस्वी और पवित्र आत्माओं ने साधना कर मानवता को सत्य, संयम और त्याग का मार्ग दिखाया है।

उनकी सनातन ऊर्जा आज भी भारत की धरती के कण-कण में समाहित है।डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि जैन साहित्य में भगवान आदिनाथ से लेकर वर्तमान तीर्थंकर भगवान महावीर तक की पावन परंपरा में वही साधक सार्थक साधना कर सकता है, जो अपने मन, तन और धन को धर्म तथा शास्त्रों के प्रति समर्पित कर मोह-माया से मुक्त होने का प्रयास करे।

आत्मशुद्धि और संयम का मार्ग ही मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाता है।डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने चिंता जताई कि आधुनिक पीढ़ी अपनी संस्कृतियों और जीवन मूल्यों को भूलकर पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति की ओर आकर्षित हो रही है।

इसका प्रभाव जीवनशैली और सामाजिक मूल्यों में दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि भौतिक सुखों की अंधी दौड़ जीवन को सार्थक बनाने के बजाय मनुष्य को पतन की ओर ले जा रही है।

ऐसे समय में भारतीय संस्कृति, त्याग, तप, संयम और आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में उतारना ही वास्तविक सफलता का मार्ग है।धर्मसभा में प्रवचन देते हुए प्रवर्तक डॉ. राजेंद्र मुनि ने कहा कि मनुष्य को अपने मन के विचारों और इच्छाओं को संयमित कर जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाना चाहिए।

इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है।

यही निरंतर बढ़ती इच्छाएं मनुष्य के मन में तनाव और अशांति का कारण बनती हैं।डॉ. राजेंद्र मुनि ने कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन प्रभु भक्ति, पूजा-पाठ और धार्मिक साधना के माध्यम से अपने मन को शांत एवं सकारात्मक बनाए रखना चाहिए।

धर्म और आध्यात्मिकता के माध्यम से जीवन में संयम, संतुलन और शांति स्थापित की जा सकती है।धर्मसभा में नौ दिवसीय तपश्चर्या करने वाले साधकों का बहुमान एवं अभिनंदन अध्यक्ष एडवोकेट रोशन लाल जैन सहित समाजजनों ने सम्मान किया।कार्यक्रम के दौरान श्रावक-श्राविका संघ की ओर से 14 अगस्त शुक्रवार को सामूहिक एकासन ग्रहण करने का संकल्प लिया गया।

धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।