उदयपुर। जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ पिछले कुछ समय से पूर्व कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत के कार्यकाल, कर्मचारियों के आंदोलन, वित्तीय आरोपों और कानूनी विवाद को लेकर चर्चा में है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर विद्यापीठ के कुलाधिपति एवं कुल प्रमुख भंवरलाल गुर्जर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कई महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।
गुर्जर ने बताया कि प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत का नियमित कार्यकाल 2 जून को पूरा हो गया था। उन्होंने कहा कि सारंगदेवोत को मनमाने तरीके से पद से नहीं हटाया गया, बल्कि कार्यकाल पूरा होने के बाद विश्वविद्यालय ने नियमानुसार कदम उठाए।
उन्होंने बताया कि कर्मचारियों के एक समूह ने ज्ञापन देकर सारंगदेवोत का कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाने की मांग की थी, जबकि दूसरे समूह ने नए कुलपति की नियुक्ति होने तक उन्हें पद पर बनाए रखने की मांग की। इसके बाद नए कुलपति के चयन तक सारंगदेवोत को कार्य जारी रखने का आदेश दिया गया। गुर्जर के अनुसार, इस आदेश को सारंगदेवोत की ओर से एक वर्ष के कार्यकाल विस्तार के रूप में प्रचारित किए जाने से कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ी और करीब दो महीने तक आंदोलन चला।
बाद में वल्लभनगर विधायक उदयलाल डांगी के हस्तक्षेप के बाद कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त हुई। इसके बाद सारंगदेवोत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वेच्छा से विद्यापीठ छोड़ने की घोषणा की। हालांकि, गुर्जर के अनुसार, उन्होंने लिखित रूप से इस्तीफा नहीं दिया। इसके बाद विश्वविद्यालय ने पूर्व आदेश निरस्त कर वरिष्ठ प्रोफेसर मंजु मांडोत को कार्यवाहक कुलपति का दायित्व सौंप दिया।
सारंगदेवोत के करीब 14 वर्ष लंबे कार्यकाल पर गुर्जर ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने लगभग एक वर्ष कार्यवाहक कुलपति के रूप में कार्य किया। इसके बाद तीन वर्ष के लिए उनका चयन हुआ और फिर दो बार पांच-पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए उन्हें कुलपति बनाया गया। इस प्रकार उनका कुल कार्यकाल करीब 14 वर्ष तक पहुंच गया।
गुर्जर ने कहा कि विद्यापीठ में यूजीसी के नियम लागू होते हैं और इन्हीं नियमों के अनुरूप कार्रवाई की गई है। उन्होंने कहा कि किसी भी कुलपति को अनिश्चितकाल तक पद पर बनाए रखना नियमों के अनुरूप नहीं है।
वित्तीय मामलों की भी चल रही जांच
विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों पर गुर्जर ने कहा कि कर्मचारियों की ओर से यूजीसी, राज्य सरकार और एसओजी सहित विभिन्न स्तरों पर शिकायतें की गई हैं। इन शिकायतों और वित्तीय मामलों की जांच चल रही है।
उन्होंने बताया कि कर्मचारियों के वेतन सहित अन्य आवश्यक खर्चों के लिए मातृ संस्था की ओर से विद्यापीठ को करीब 6 करोड़ रुपये ऋण के रूप में दिए गए थे। अब इन राशि का उपयोग किन मदों में और किस प्रकार किया गया, इसकी जांच की जा रही है।
मामला राजस्थान हाईकोर्ट में
इस बीच प्रो. सारंगदेवोत ने अपने पद से संबंधित कार्रवाई को राजस्थान उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। गुर्जर ने बताया कि विश्वविद्यालय ने भी अपना पक्ष सुरक्षित रखने के लिए न्यायालय में कैविएट दाखिल की है। मामले में अगली सुनवाई 20 अगस्त को प्रस्तावित है।
गुर्जर ने कहा कि विश्वविद्यालय संस्था के हित में न्यायालय में अपना पक्ष मजबूती से रखेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि कानूनी विवाद समाप्त होने के बाद प्रो. मंजु मांडोत के नेतृत्व में विद्यापीठ में स्थिरता आएगी और शैक्षणिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था को और मजबूत किया जा सकेगा।
फिलहाल पूर्व कुलपति के कार्यकाल और पद से संबंधित मामला न्यायालय में विचाराधीन है, जबकि वित्तीय आरोपों की जांच जारी है। आने वाले दिनों में न्यायालय के निर्णय और जांच के निष्कर्ष से पूरे मामले की स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।