उदयपुर, उदयपुर में झील  विकास को   पर्यटन-मनोरंजन केंद्रित बना देने से  पर्यावरणीय संतुलन   और सार्वजनिक सुरक्षा खतरे में  है।  झीलों पर बढ़ता मानवीय और व्यावसायिक दबाव न केवल उनके पारिस्थितिक तंत्र को कमजोर कर रहा है, बल्कि जल-आधारित दुर्घटनाओं की संभावनाओं को भी बढ़ा रहा है। अनियंत्रित  पर्यटन गतिविधियाँ इस संवेदनशील तंत्र के लिए बड़ा  खतरा  हैं। जबलपुर जैसे हादसों से सबक नहीं लिया जा रहा है। 

 यह चिंता रविवार को आयोजित झील संवाद में व्यक्त की गई।

झील विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने कहा  कि झीलों में बोट और स्पीड बोट की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इनकी संख्या तथा  संचालन के लिए कोई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल (नियमावली) लागू नहीं है।  नाव आवागमन के कोई निश्चित रूट तय नहीं  हैं। बोट फिटनेस, लाइफ जैकेट, प्रशिक्षित कर्मी या प्रति नाव अधिकतम यात्रियों की सीमा पर कोई ध्यान नहीं  दिया जाता  है।  इन सभी लापरवाहियों  से  झीलों में नाव भ्रमण एक “हाई-रिस्क  एक्टिविटी ” बन चुकी है। 

झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि बढ़ती स्पीड बोट गतिविधियों से वेव-इंड्यूस्ड इरोशन (लहरों से कटाव) और नावों के आपसी टकराव की आशंका बढ़ रही है। सूर्यास्त के बाद भी नौकायन जारी रहना सुरक्षा मानकों के विरुद्ध है और इससे दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ गया  है।

पर्यावरणविद् नंद किशोर शर्मा कहा कि  झीलों को केवल पर्यटन संसाधन के रूप में देखा जा रहा  है । झीलों की  इकोलॉजिकल कैरीइंग कैपेसिटी  की  पूर्णतया अनदेखी है। इससे  पर्यावरणीय संकट  बढ़   रहा  है   तथा मानव जीवन के लिए   गंभीर खतरा है। 

समाजसेवी विनोद कुमावत ने बताया कि कई होटल अपनी निजी जेटियों पर देर रात तक आयोजन कर रहे हैं, जिनमें न तो सुरक्षा प्रबंध होते हैं और न ही प्रशासनिक अनुमति। यहां भी दुर्घटनाओं  की आशंका जोखिम  है।

वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह ने कहा  कि उदयपुर में  हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन  आवश्यक है। 

संवाद से पूर्व मांजी मंदिर परिसर में श्रमदान किया गया।